प्यार के बिना
सूरज भी नभ पर नहीं करता राज
नहीं बहती बयार, नहीं झूमते वन
ख़ुशी से…
प्यार के बिना नहीं होती
सुंदरता
न ही अमरता होती है
प्यार के बिना
पर अंतिम प्यार होता है
अनूठा
पतझड़ के फूल-सा
अक्सर पहले प्यार से अच्छा
यह नहीं देता न्योता
आवारा आँधी-से
उन्मादों को
लड़कपन की सनक को, बहके बोल को
नहीं देता न्योता
और पतझड़ की ठंड में
खुले में खिलता
यह वसंत के कोमल फूलों-सा
बिल्कुल नहीं दिखता…
बल्कि मंद हवा के बदले आँधियाँ
दुलारती हैं इसे
और आवेग की जगह मूक स्नेह
घेरे रहता है इसे
और मुरझाता है, मुरझाता है प्यार
अंत में
मुरझा जाता है दु:ख से, कोमलता से,
मगर बिना किसी ख़ुशी के
और पूरे ब्रह्मांड में नहीं है ऐसी कोई
अमरता,
चूँकि अमरता भी नहीं होती
प्यार के बिना!
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक रीनू तलवाड़, प्रचण्ड प्रवीर
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