प्रेम : एक परिभाषा
prem ha ek paribhasha
हमर प्रेम की थिक से हमरा धरि बूझल अछि,
हम मात्र हमहीँ छी,
अहंकेर छूति नहि,
प्रेम विसंगति हम बूझल नहि जीवनमे
संगति थिक प्रेम जे समाज बीच रखने अछि
हमर 'हम'
यथासमय, रहि कऽ समाज बीच
पुत्र, पिता, मित्र, भाय, बन्धु, पति,
शिक्षक ओ छात्र आदि-आदि रूप बहुत,
सब किछु बनैत अछि।
ई सभ किछु बनबामे बहुत किछुक काज छैक,
अतः ताहि बहुत किछुक करितो जोगाड़ अछि।
पिताकेर प्रेम—
सौँस नारिकेर पुत्र हेतु,
ऊपरसँ सक्कत ओ रुच्छ सन लगैत अछि,
भीतरमे सजल, तरल, दुग्धोज्ज्चल कोमल फल
खयलेपर बुझल जाय, व्यर्थ स्वाद कहने की?
पुत्र केर प्रेम—
पिताकेर हृदय-घृतक हेतु
रौद थीक,
देखलासँ लगले पघिलि जाइछ।
शिक्षककेर प्रेम
शुद्ध भुल्ली कुसियार बुझू,
देखबामे ठेङा सन, देखि चौँकि उठी,
मुदा जँ-जँ चिबबैत जाउ
मधुरइ बुझैत जाउ।
मित्रकेर प्रेम
पानि चिन्नीकेर रूप स्वतः,
आपसमे मिललासँ भिन्नता समाप्त तुरत।
भाय-बन्धुकेर प्रेम
डोरी ओ डोल बनल
तृषित जे समाज तकर तृषा मेटा दैत अछि।
जीवन थिक साइकिल,
पति-पत्नीकेर प्रेम क्रैंक-चेन बनल
साइकिलकेँ आगाँ घिचैत अछि।
किन्तु जे समग्र रूप प्रेम हम देखल से
दूध मध्य अन्तर्हित नेनुक समान अछि,
मथलासँ फक्क दऽ कऽ ऊपर अलगि जाइछ,
लाख यत्न कयलोपर मिश्रित नहि होइत अछि।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 349)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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