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प्रेम-दासत्व

prem dasatv

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

प्रेम-दासत्व

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    मैं रोऊँगी—

    कोई नहीं सुनेगा…

    फिर बोलूँगी—

    सब नज़रअंदाज़ कर देंगे…

    तुम रोओगे—

    हाहाकार मच जाएगा…

    फिर बोलोगे—

    धरती धमक जाएगी…

    एक स्त्री का चयन हर बार ही होगा ग़लत…

    लेकिन पुरूष होने के कारण तुम्हारे

    चयन और निर्णय हर बार ही होंगे सर्वश्रेष्ठ…

    तुम स्त्री-छवि का मानकीकरण करोगे…

    प्रेम का स्वरूप निर्धारित करोगे;

    और कहोगे कि ‘ए लड़की’ अब करो मुझसे प्रेम!

    लड़की करेगी तुमसे प्रेम;

    ख़ूब सारा टूट कर प्रेम…

    ना रखेगी किसी मान-मर्यादा का ध्यान…

    तुम तभी बाँधना शुरू करोगे उसके चरित्र की रस्सियाँ…

    एक-दो-तीन-चार-पाँच;

    कि तभी छठी रस्सी का सिरा तुम्हें कहीं और उलझा-सा लगेगा;

    और तुम झट से कहोगे—

    ‘ऐ लड़की तुम्हारे चरित्र में कुछ दाग़-सा है,

    तुम अब क़ाबिल नहीं रही मेरे प्रेम के,

    क्योंकि तुम उस सीमा के पार खड़ी हो,

    जो मैंने कभी नहीं की थी निर्धारित,

    विखंडित चरित्र वाली तुम और तुम्हारा प्रेम भी विखंडित!’

    लड़की छली हुई वही कि वही रह जाएगी—

    मूक और बदहवास…

    और तुम,

    दिवानो-सा बढ़ते रहोगे निरंतर अनथक,

    अपना ही बनाया हुआ कोई प्रेम-गीत गुनगुनाते हुए…

    दीवाने राहगीर! कितने ही लोग तुमसे;

    मिलेंगे-घुलेंगे और फिर कुछ गुनेंगे…

    कि वो ठहरी हुई लड़की सचमुच—

    कभी ना थी ठहरी;

    पढ़ेंगे तुम्हारे कसीदे—

    आशिक की बेबसी पर ग़ज़ल होने की तरह;

    प्रेम में सुना जाएगा—

    बस तुम्हें और तुम्हारी बातें…

    उसकी बातें अब कभी कोई नहीं करेगा,

    वो दोहराई जाएगी—

    जब होगी चर्चा चरित्रहीनता की और तितलियों की…

    और इस तरह खूले आकाश जैसे प्रेम पर भी तुम्हारा क़ब्ज़ा हो जाएगा!

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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