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प्रेम और जीवन

prem aur jivan

अंकित कुमार

अंकित कुमार

प्रेम और जीवन

अंकित कुमार

और अधिकअंकित कुमार

    जीवन ने मुझे बहुत कुछ सिखाया पर प्रेम ने सिखाया कि

    सीखना और समझना एक बात नहीं होती

    जीवन चलता रहता है ऋतुओं की तरह

    कभी वसंत की उजली हँसी में, कभी पतझड़ की नीरवता में

    पर प्रेम हर ऋतु में अपने अलग अर्थ लिखता रहा

    जब प्रेम था

    तो साधारण दिनों में भी एक अनकही चमक थी

    और जब वह नहीं रहा तब भी उसकी स्मृति

    अँधेरे में जलते दीपक-सी

    मन के किसी कोने में टिम-टिमाती रही

    जीवन ने बताया कि हर मिलन का एक अंत होता है

    पर प्रेम ने प्रतिवाद किया कुछ लोग चले जाते हैं

    किन्तु उनका होना हमारे भीतर बना रहता है

    शायद इसी कारण प्रेम और जीवन का संबंध

    नदी और समुद्र जैसा है एक बहता है

    दूसरा उसे अर्थ देता है

    जीवन बस जीने का नाम नहीं और प्रेम केवल पा लेने का

    दोनों का सौंदर्य तो उन अधूरे क्षणों में छिपा है

    जहाँ मनुष्य टूटते हुए भी सुंदर बना रहता है

    अंततः मैंने जाना जीवन समय का सत्य है

    और प्रेम स्मृति का

    एक समाप्त हो जाता है दूसरा समाप्त होकर भी

    हमारे भीतर जीवित रहता है

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंकित कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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