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प्रात

praat

सरस सुन्दर जीवनक उपहार

कि

अवसाद केर अछि तीक्ष्ण उपमान?

प्राची दिशा केर भालपर

संहारकारी शंकरक तेसर नयन सन

उदित भऽ गेल रक्तवर्णक एक गोलक

छिटकि रहलै अग्निकण सन

आतपक दल,

मने हो संकल्प कयने

करबे करत नष्ट

तिमिर रूपी पापस परिपूर्ण धरतीक।

दिन भरिक दलित बाट-घाट

रातुक रानीकेर कोमल कोरामे

शरण पाबि,

छल बिसरि गेल

असह पीड़;

किन्तु आब?

लप-लप करैत दुपहरियोमे

बाल-वृद्ध वणितागण

निज स्वेदक बुन्ना-बुन्नीमे

अछि करैत काज,

साँझ खन

चारि सेर बोनि पयबा हेतु

आ,

दिन भरिक बोनि ल‍ऽ

कूटि-पीसि—

कहुना लैछ संतोष पाबि;

किन्तु पुरुब केर रूप देखि

कँपइत आङसँ उठैछ बाजि—

नहि एतय शान्ति!

पाजु करैछ निश्चिन्त भऽ

सिलेबिया बरदक जोड़ा

किन्तु आब—

चैन केर बंशी बजा सकतै कोना ओ!

बसुधा बहिनकेर भाइ चंदा,

विश्वकेर विख्यात मामा,

अन्तिम प्रणतिमे झुकि

विदा भऽ गेल छथि

देखि बहिनिक भालपर

दुर्भाग्यता केर चिह्न!

सरिता-पुलिनपर चकबाक जोड़ी

कऽ रहल छल गप्प जे

बिछुड़ि कऽ भऽ गेल अछि से कात

व्याप्त अछि अवसाद केर

धूँआ जकाँ किछु भाब

पसरल ओना हो कत्तौ नव उल्लास।

स्रोत :
  • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 59)
  • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
  • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
  • संस्करण : 1988

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