तुम्हारे इंतिक़ाल से चंदेक रोज़ पहले
मौत ने तुम्हारी ही उम्र के एक और शख़्स पर नज़र गड़ाई थी :
बीस साल की उम्र में तुम एक विद्यार्थी थे और वह एक मज़दूर,
तुम संपन्न और संभ्रांत, और वह एक ग़रीब आम आदमी :
लेकिन वह दौर जैसे तुम्हारे लिए सौग़ात था,
वैसे ही उसके लिए भी था—
पुराना रोम नई शक्ल ले रहा था।
बेचारा त्सुख़ेत्तो, मैंने उसकी लाश देखी है।
रात के वक़्त, शराब में धुत्, यहाँ-वहाँ डोल रहा था
कि सान पाओलो से आती ट्राम ने उसे अपनी चपेट में ले लिया।
ट्राम उसे, रेलिंग के साथ-साथ कई गज़ दूर
चिनार के दरख़्तों तक घसीटती रही,
चंदेक घंटे उसका जिस्म पहियों के ही नीचे रहा :
आसपास कुछेक लोग भी आ जुटे थे, ख़ामोशी के साथ उसकी तरफ़
देखते हुए,
रात काफ़ी हो चुकी थी और थोड़े लोग ही यहाँ-वहाँ थे।
तभी, तुम्हारे ही नक़्शे कदम पर चलने वाला एक और
आदमी प्रकट हुआ,
मनहूस वर्दी-धारी, दादाओं जैसा दिखता, एक बूढ़ा पुलिसिया,
'पीछे हटो, हरामियो!' के चाबुक सटकारते हुए, उसने,
घिरते चले आ रहे लोगों को पीछे हटाया,
फिर एक एंबुलेंस आई और त्सुख़ेत्तो को उठा ले गई।
लोग भी तितर-बितर हो गए,
बस्स्, इक्के-दुक्के, खून और गोश्त-सने, चिथड़े यहाँ-वहाँ पड़े रहे।
पास के ठेके की मालकिन उसे जानती थी,
उसने एक नए ग्राहक को बताया कि त्सुख़ेत्तो एक ट्राम की चपेट में
आकर चल बसा।
उसके चंदेक रोज़ बाद तुम भी कूच कर गए :
त्सुख़ेत्तो तुम्हारी महान रोमन जाति का ही एक सदस्य था,
एक बदक़िस्मत शराबी, न कोई घरबार—न आगे पीछे कोई रोने वाला,
सारी-सारी रात शहर में नाशादो-नाकारा भटकता रहता था—
न जाने कैसे जीता हुआ!
तुम उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे, क्योंकि
तुम उस जैसे हज़ारों मज़लूमों के बारे में भी कुछ नहीं जानते थे।
अगर मैं तुमसे पूछूँ कि त्सुख़ेत्तो जैसे लोग
आख़िरकार तुम्हारी दया के पात्र क्यों नहीं थे
तो शायद यह मेरी ज़्यादती होगी!
ऐसी बहुत-सी गुमनाम जगहें हैं, जहाँ माँएँ और बच्चे
अभी भी पुराने वक़्तों में रह रहे हैं—
तुम्हारे श्रीनिवास से ज़्यादा दूर नहीं,
सेंट पीटर के ख़ूबसूरत गुंबद के ज़ेरे-साए ही
ऐसी एक जगह है गेल्सोमिनो...
दो हिस्सों में बँटी एक पहाड़ी, और नीचे
एक नाले और महलनुमा इमारतों की क़तार के बीच,
एक बदरंग, घुन-लगी बस्ती—घर नहीं; बल्कि सुअरबाड़े।
तुम्हारे श्रीमुख से अगर अकेला एक शब्द फूट पड़ता—
सिर्फ़ एक इशारा हो जाता, तो तुम्हारे उन बेटों में से हर एक पास
अपना एक घर हो सकता था,
लेकिन तुम्हारे श्रीमुख से वह शब्द नहीं फूटा—तुम्हें वह इशारा गवारा
नहीं हुआ।
भला, यह मार्क्स को क्षमादान देने जैसी कोई पेशकश तो नहीं थी!
हज़ारों-लाखों ज़िंदगियों को युगों से तबाह करने वाली
एक प्रचंड लहर ने
तुम्हें त्सुख़ेत्तो से, त्सुख़ेत्तो के जीवन-धर्म से दूर किया :
लेकिन तुम्हारे धर्म में दया और करुणा का ज़िक्र तो है!
तुम्हारे अहद में, हज़ारों लोग, ऐन तुम्हारी आँखों के नीचे
ग़लीज़ ज़िंदगी जीते रहे हैं!
पाप का मतलब बुराई में लिप्त रहना नहीं होता—
और तुम्हें यह पता था :
पाप का मतलब अच्छे कामों से दूर रहना होता है!
कितने अच्छे काम तुम कर सकते थे!
लेकिन नहीं किए :
दरअस्ल, तुम अब तक के सबसे बड़े पापी हो!
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 297)
- रचनाकार : पिअर पाओलो पासोलिनी
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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