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फलाँ-फलाँ की दुश्मन होती है

phalan phalan ki dushman hoti hai

वैशाली थापा

वैशाली थापा

फलाँ-फलाँ की दुश्मन होती है

वैशाली थापा

और अधिकवैशाली थापा

    तुमको गालियाँ मिलीं,

    हासिल के रंग भी मिले

    मुझे मिला ढेर सारा बेचारापन और ये कहावत

    कि फलाँ-फलाँ की दुश्मन होती है

    मैंने पत्थर कभी नहीं तोड़ा

    मैं गेहूँ साफ़ करती थी

    बहुत सारे विश्वास में से

    ईर्ष्या के कुछ कंकड़ चुनती और छिटक देती

    तुमने जो मेरा घर तोड़ा

    असल में तोड़ा तो तुमने कुछ भी नहीं

    बस मुझे अवगत कराया

    कि मेरा कोई घर था ही नहीं

    तुमने दुश्मन बन कर भी

    दोस्ती निभाई

    इस मित्रता के चलते ही मुझे बताओ

    तोड़ना, चुनने से ज़्यादा सरल है क्या?

    क्या वाक़ई फलाँ, फलाँ की दुश्मन होती है?

    मेरी माँ अक्सर दूसरों के घर में

    अचार डालती थी

    खींचिए का आटा राँधती थी

    जापे का लड्डू बाँधती थी

    उसके गेहूँ में कंकड़ नहीं थे

    उसके हासिल का पथ भिन्न था

    मैं और तुम दोनों ही दीन हैं सखी

    बस अंतर इतना है

    तुम मुझ से ज़्यादा बेचारी हो

    कि तुमने मुझे फ़तह किया है

    अब तुम किसी के घर में

    अचार नहीं डाल सकती

    खींचिए का आटा नहीं राँध सकती

    जापे का लड्डू नहीं बाँध सकती

    मगर तुमने मुझे भ्रम से मुक्त किया है

    बताया है कि मेरा हासिल मेरा सुख नहीं हो सकता

    जो तुमने छीना वो तुम्हारा भी सुख नहीं हो सकेगा

    क्योंकि जिसे छीना या पाया जा सके

    वो किसी का सुख नहीं हो सकता

    वह तुम ही हो,

    जिसने पूरी तरह से मेरे पथ को

    परम तत्व की दिशा में मोड़ दिया है

    मैं तुमसे निराश नहीं हूँ

    मेरी माँ भी तुमसे निराश नहीं है

    तुमने तो मित्रता निभाई है

    औरत, औरत की दुश्मन होती है

    इस कहावत को फिर झुठला दिया है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मेरे घर में पृथ्वी (पृष्ठ 132)
    • रचनाकार : वैशाली थापा
    • प्रकाशन : हिंदीस्थान प्रकाशन
    • संस्करण : 2025

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