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पश्चाताप की एक [?] शाम

pashchatap ki ek [?] shaam

सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

पश्चाताप की एक [?] शाम

सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    इस गर्म शाम

    देह दही की तरह पिघल रही थी

    मुझमें एक ऋतु भीग आई थी

    आहिस्ता-आहिस्ता

    झड़ रहा था नीम

    अपनी पेशाब पर लेटा

    एक कुत्ता झाड़ रहा था कान

    जिसे एक चींटी घेर रही थी

    उस वक़्त—

    महत्त्वाकांक्षा बूढ़ी छिपकली-सी सुस्त हो चली थी

    बस उम्मीद ही बहुवचन में याद आ रही थी

    और अतीत का दूध दिमाग़ में जल रहा था

    उम्मीद—

    मुझे सबसे अधिक उम्मीद

    अपने पश्चाताप से थी

    उसने कभी निराश नहीं किया

    सबसे सुंदर से भी पछताया हूँ मैं

    पछताना पानी में पानी सरीखा था

    जहाँ से लौटना भी पछताना था

    बहुत दूर से—

    एक नदी की याद

    बहुत दूर तक आ रही थी

    भिगोती पानी को मिट्टी में

    बहुत दूर तक जाती थी जो

    तुम्हारी याद

    एक किनारे से आई थी

    जहाँ का आख़िरी फूल मुरझाकर

    सूखी रोटी हो आया था

    जिसे कुतरते-कुतरते भाप की गिलहरी

    मेरी आँख में घुस गई थी धप् से

    जिसे खोजने उसके पीछे गया

    और—

    और मैं अब तक नहीं लौटा

    मुझे खोजने के लिए

    एक और गिलहरी खोज रही है रास्ता

    मेरे ही भीतर

    उसे भी जगह दो मेरे पश्चाताप!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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