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परदेसी कै चिट्ठी-पाती

pardesi kai chitthi pati

आशाराम ‘जागरथ’

आशाराम ‘जागरथ’

परदेसी कै चिट्ठी-पाती

आशाराम ‘जागरथ’

और अधिकआशाराम ‘जागरथ’

    कक्षा तीनै मा पढ़त रहेन

    चिट्ठी-पाती सब बचवावैं

    पाई ना पकरि कलम ढंग से

    तब्बौ सब चिट्ठी लिखिवावैं

    मुलु काव करैं वनहीं सबहीं

    पढ़वइया गाँव मा कमै रहे

    जे रहा तनी बड़वरकन मा

    छोटजतियै जात बेरात रहे

    घर आवैं मेर-मेर मनई

    भिनसारे संझा राती मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    चिट्ठी लिखवावै यस बइठिन

    झौवा भै गऊवाई गावैं

    भल आँस चुवावैं भलर-भलर

    बोलत–बोलत रोवै लागैं

    हाँड़ी–गगरी ठनठन गोपाल

    अपुवाँ कामे नाहीं जाते

    पंडित कै लरिका मारे बा

    घरहीं लंगड़ात चलत बाटे

    कुछ पइसा-कौड़ी पठय दियौ

    यक्कै धोती बा देहीं मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    जूड़ी बोखार हमरे बाटै

    लिखि द्या बाकी ठीकै बाटै

    भइँ’सिया बियानी बा पड़िया

    गइया बिकात नाहीं बाटै

    सुरसतिया सरियारिग होइगै

    कसि मा नाहीं बाटै हमरे

    अब गवन-दोंग निबकावै’क् बा

    कउनौ खानी निबरे-पतरे

    समधी सपनेव मागैं अइहैं

    मनहग ह्वै मानब अगहन मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    होंठ मुसुक्की लाली मा

    चकमक आँखी मा बाती मा

    दिन भये त् कउवा देखि डरै

    डुडुवाय गुजरिया राती मा

    अपुवाँ कलकत्ता सालन से

    चिट्ठी-पाती ना खोज खबर

    अँगिराय जवानी कसमसाय

    चुन चुनचुनाय खब खबर-खबर

    पकरी नखरी बहि-बहि रोवै

    खुद खोंचि उँगुरिया आँखी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    पकरे हाथे अन्तरदेसी

    मुस्की मारैं नइकी भउजी

    चुप्पे अइसन पाती लिखि द्या

    घर भागा आवैं परदेसी

    लिखि द्या कि बहुत अगोरी थै

    ससुरे मा नाहीं लागै मन

    दस दिन कां ताईं आइ जायँ

    नाहीं, चलि जाब नइहरे हम

    बुढ़ऊ कै मुँह फूला बाटै

    मनिआडर पाइन देरी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    स्रोत :
    • पुस्तक : पाहीमाफी (पृष्ठ 185)
    • रचनाकार : आशाराम ‘जागरथ’
    • प्रकाशन : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
    • संस्करण : 2021

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