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बड़े ताल की दाँती के बिरवा के जिउका जिउ जागा।

देखिसि पानी की छाती पर वहे कि परछाँहीं पयिरयि।

अपनयि रूपु निहारि बिरउनू अपने मन ते कहयि लाग,

मयिं तउ मयिं, यिहु अउरु कउनु, जो म्वारयि अस महिकां घूरयि?

मयि जान्यउँ सबु जरि-भुँजि कयि अब हीरुयि-हीरु हियाँ रहिगा;

मुलु उयि हीरउ मा देख्यउँ कुछ-कुछु का, का, सब कुछु चपटा।

बिरिछ राज तपु करयि लाग, नथुनन ते स्वाँसा साधि-साधि,

सबयि बयारिन मूड़ु लड़ावयिं कब लागयि उनकी समाधि।

पाला पर सिकुरयिं पानी मा, सउ-सउ दाँउँ नहान करयिं,

सुर्जन की आगी मा देंही फूँकि-फूँकि जपु ज्ञानु करयिं।

बिरऊ जस-जस जोग करयिं, तस-तस सुँदरापा बाढ़ि रहा,

रस के लोभिन का उनहे तर र्याला-म्याला लागि रहा।

झुण्ड झुण्ड पंछी आवयिं पंखुरी-पातिन से खेलु करयिं,

भँवरा चहुँदिसि नाचि-नाचि फूलन के मुँहि का चूमि लेयिं।

दिन का नखरा दूरि होयि जब राति अँध्यरिया घिरि आवयि,

परछाहीं छपट्यायि रहयि, बिरऊ का जिउ कुछु कल पावयि।

मुलु जस फिरिते भोरु होयि, फिरि वहयि किंगिरिया वहयि रागु,

क्वयिली गीतु सुनावयि लागयिं, चलयि पपिहरा साजि साजु।

दिन, महिना, बरसयि क्यतनी सब आजु काल्हि मा बीति गयीं;

पर परछाही साथ छाँड़िसि बिरवा की दुरुगति भयी।

आखिर एकु अयिस दिनु आवा दुख-सुख का बन्धनु टूटि परा,

बिरवा आपुयि रूपु ताल की छाती पर भहरायि गिरा।

तालु बापु जी अपने लरिका का क्वाँरा मा कसि लीन्हिनि,

खोलि करेजे की क्वठरी तिहिमा तिहका पउढ़ायि दिहिन।

बिरवा मुकुति पायिगा जब ते, तबते वुहु विद्याँह बनिगा,

परछाहिउँ का रूप छाँह के साथयि पानी मा मिलिगा।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 134)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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