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पाकिस्तान के शायरों के नाम एक पत्र

pakistan ke shayron ke naam ek patr

उदय प्रताप सिंह

उदय प्रताप सिंह

पाकिस्तान के शायरों के नाम एक पत्र

उदय प्रताप सिंह

और अधिकउदय प्रताप सिंह

    [पाकिस्तान के शायरों ने 1966 में भारत के एक मुशायरे में इस आधार पर आने से इनकार किया था कि भारत-पाक संबंध अच्छे नहीं हैं।)

    मेरे दोस्तो, तुम को लिखें भी तो लिखें अब क्या

    कि तुमने भावना के रास्ते भी बंद कर डाले

    विभाजन तो चमन का था, बुलबुलें आज़ाद थीं अब तक

    मगर अब बुलबुलों के भी घृणा ने पर कतर डाले।

    शिकायत है नहीं हमको तुम्हारी उस हुकूमत से

    कि जिसके लोहे की सॉकल तुम्हारे हाथ बाँधे है

    तुम्हारी कल्पना पर पड़ रहे तलवार के साये

    तुम्हारा मुक्त चिंतन मौत को भी साथ बाँधे है।

    भला उम्मीद कोई क्या करेगा उन बग़ीचों से

    कि जिनके मालियों ने ही घृणा के शूल बोए हों

    जहाँ पर धार्मिक संकीर्णता ही मुख्य संस्कृति हो

    जहाँ पर बीज बोने से प्रथम विष में भिगोए हों।

    तुम्हारे देश में क्या ऐसे मसले हैं नहीं जैसे

    ग़रीबी, भुखमरी, बीमारी, बेकारी, नफ़ाखोरी

    हमारे देश में तो मिल के सब के सब मतालंबी

    इन्हीं मसलों से लड़ते हैं कि उन में अक़्ल है थोड़ी।

    तुम्हारे नाख़ुदाओं को ख़ुदा बनने की हसरत है

    मगर ये बात छोटी अक़्ल में उनके नहीं आती

    कि जिन मेहनतक़शों को पेट भर रोटी नहीं मिलती

    है उनकी भूख बेमानी जिहादों से नहीं जाती।

    उन्हें समझा नहीं सकते हो तुम फिर कौन समझाए

    किसी की जान लेना धर्म का अपमान करना है

    अगर तुम दे सको तो ज़िंदगी दो उन ग़रीबों को

    कि जिनका काम औरों के लिए विषपान करना है।

    यही है धर्म तो कुछ भी नहीं है सिर्फ़ धोखे हैं

    प्रगति के रास्ते में शूल बिखराए गए हैं ये

    कहीं मेहनतकशों के हाथ महलों तक न जा पहुँचें

    कि उनकी गर्दनों में तौक पहनाए गए हैं ये।

    कभी हमदर्द बनकर सोचते हैं हम कि तुमको भी

    बचाएँगे पतन से यदि, बुरे हो तो बुरा क्या है

    मगर फिर सोचते हैं आदमीयत है नहीं जिसमें

    भला ऐसी हकूमत में बचाने को बचा क्या है?

    मगर इस अधपतन के आप भी तो एक कारण हैं

    घृणा को प्यार के अंदाज़ तुम सिखला नहीं सकते

    क़लम को तोड़ दो अपनी जला दी उन किताबों को

    अगर तुम आदमी को रास्ते पर ला नहीं सकते।

    कलम को हाथ में लेने का मतलब ये नहीं होता

    कि बस हम दर्द अपना गुनगुनाएँ और रह जाएँ

    किसी के गेसुओं में फूल टोंकें प्यार के लेकिन

    घृणा की ऑधियाँ आएँ तो उनके साथ बह जाएँ।

    क़लम का काम ये भी है कि वो आवाज़ दे उनको

    कि जिनकी आस्थाएँ तंग गलियों में भटकती है

    कि जिनकी धीरता को डस गए हैं नाग ज़हरीले

    कि जिनकी अर्चना से ख़ून की बूँदें टपकती है।

    ज़रूरत ही नहीं है कुछ नक़ाबों की नए युग में

    कि हम सब आदमी को आदमी के रूप में देखें

    पुराने मानकों की रोशनी कुछ पक्षपाती थी

    चलो हर पात्र को चल कर सुबह की धूप में देखें।

    भला ऐसी दिवाली के दियों से लाभ ही क्या है

    कि जिनकी रश्मियाँ भी रात होने की दुहाई दें

    'उदय' उस रोशनी को रोशनी कैसे कहें जिसमें

    मनुज छोटे मगर परछाइयाँ लंबी दिखाई दें।

    स्रोत :
    • रचनाकार : उदय प्रताप सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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