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पैंतीस कम एक

paintis kam ek

ऋचा कश्यप

ऋचा कश्यप

पैंतीस कम एक

ऋचा कश्यप

और अधिकऋचा कश्यप

    सालों का ढेर जमा होता जा रहा है

    मेरी आंतरिक अवयव से लेकर

    बाहरी छाल पर

    वो वर्ष ढो रहे हैं

    मेरे बूढे होते अनुभवों को

    जो साँस लेते रहते है मेरे अँधेरों में भी

    मैं जीने की आदी हूँ

    बूढ़ी होना चाहती हूँ

    बस ज़िंदगी मेरी बूढ़ी हो

    सफ़ेद केशों की मात्रा अब अधिक है

    आँखों के किनारों में

    एक पक्षी का पंजा धंस गया है

    वह जतन करता है निकलने का

    मैं आज़ाद उसे करने की तरकीब लगाती हूँ

    पैंतीस कम एक, अंक मात्र है

    लेकिन पात्र युगों के जीते हैं मुझमें

    कुछ मृत्यु के पश्चात भी अमर हैं

    कुछ रेंगते बढ़ रहे हैं मेरी ओर

    भयानक और घिनौने

    जिनके जैसा मुझे नहीं होना

    मगर मैं विवश हूँ

    यह छल और छिलती छाल का निरंतर द्वंद्व

    मैं डगमगा भले ही जाऊँ

    लेकिन जीना तो फिर भी है

    उस पक्षी की तरह जिसने

    अपने पंजे मेरे आँखों के कोनों में गाड़ दिए हैं

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋचा कश्यप
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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