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पहाड़ के उन डाँडा-काँठों से

pahaD ke un DanDa kanthon se

मनोज चौधरी

मनोज चौधरी

पहाड़ के उन डाँडा-काँठों से

मनोज चौधरी

और अधिकमनोज चौधरी

    शहर का रास्ता लंबा था

    जब निकला

    आँखों में बस इक सपना था

    मेरी आँखों में नहीं समाता था

    उस सपने में आधे जून की रोटी की गंध थी

    जिसके लिए मैं

    पंदेरा, बुरांश, काफल की घाटी

    और अपनी माटी छोड़ आया

    शहर की बड़ी इमारतों की सीढ़ियाँ

    चढ़ता मेरा बचपन

    कब एक अधेड़ आदमी की याद

    बन गया

    मैं पहाड़ की हवा के साथ

    उड़कर आया बुरांस फूल हूँ

    जो लिफ़्ट में खड़ा

    एक ऐसा बटन ढूँढ रहा है

    जो मुझे मेरे गाँव के

    मेरे घर के दरवाज़े पर ले जाकर छोड़ दे

    लेकिन ऐसा कोई बटन नहीं है

    लेकिन हार नहीं मानी मैंने

    मैं भूल गया हूँ

    मैं शहर में क्यों आया था

    मैं इस लिफ़्ट में कहाँ जाने के लिए आया था

    अब मैं लिफ़्ट में सिर्फ़ वही बटन ढूँढ़ने आता हूँ

    मुझे उम्मीद है

    एक दिन वह मिलेगा

    मैं हार नहीं मानूँगा

    मैं कहाँ गया

    एक बच्चा जो रामनगर की

    बस में बैठा

    खिड़की की सीट ढूँढ़ रहा था

    आज एक दिल्ली के एक बड़े दफ़्तर की लिफ़्ट में खड़ा

    एक बटन ढूँढ़ रहा है

    जो उसे उसके घर छोड़ दे

    वह बटन नहीं मिला लेकिन

    मैं सारा जीवन यही

    सुना है कि लड़का मेहनती है

    मैंने अभी तक हिम्मत नहीं हारी है

    और एक एक दिन

    मुझे इसी लिफ़्ट में मिलेगा वो बटन

    जिसकी मुझे कब से तलाश है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनोज चौधरी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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