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पागलपन के शहर

pagalpan ke shahr

कारलोस बाइएर

कारलोस बाइएर

पागलपन के शहर

कारलोस बाइएर

और अधिककारलोस बाइएर

    तो यही वह दिन है जब ऊँचे हो जाते हैं शहर

    जब शहर बन जाएँगे रेगिस्तान ऐसे

    जो रह जाते हैं अकेले

    शहर पागलपन के नहीं होंगे जिनमें निवासी

    बेचेहरा इंसानों के सिवाय

    और उनके सिवाय

    मनाही है जिन्हें ऊपर चढ़ने की

    यह पहाड़ियाँ चढ़ने की जिनका नाम नहीं है कोई

    दंडित हैं निकल पाने के लिए अपने सुराख़ों से

    काई और मिट्टी के बने

    इन पुलों के नीचे

    सुराख़ जहाँ चाय पी जाती है और मुहब्बत भी की जाती है

    काई और मिट्टी के सुराख़ जहाँ रहते हैं इंसान भी

    लगते हैं जो ईश्वर से।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 295)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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