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नानाजी के श्लोक

nanaji ke shlok

सच्चे तौर पर

सम्मान की वजह से डर

मुझे सिर्फ़ एक पुरुष से लगता था

नानाजी ने मुझे तीन श्लोक बताए थे

सुबह उठते ही दोहराने के लिए

मैं जानता हूँ

पृथ्वी को विष्णुपत्नी कहकर, क्षमा माँगकर भी

मैं रहूँगा

जीवनपालक विष्णु की सभ्यतापोषक प्रिया का अपराधी ही

दोहराता रहूँगा अपराध

जिनसे पृथ्वी होती रहेगी जीवन के लिए संकुचित

बढ़ती रहेगी ग्लोबल वार्मिंग

मैं पृथ्वी की बाकी सब संतानो की हत्यारी प्रजाति, मानव हूँ

हाथ में देवी-देवताओं का वास होने की अनुभूति कर भी

इन हाथों से हर काम ठीक ही हो, ऐसा भी नहीं

और कंधों पर बैठे फ़रिश्ते

दर्ज करते रहेंगे अच्छे-बुरे सब काम

बुरे काम दज करने वाले फ़रिश्ते की स्याही होगी कुछ ज़्यादा ही ख़र्च

सात चिरंजीवी महापुरुषों का स्मरण

मुझे नहीं बना देगा चिरंजीवी या शतायु

ख़ुद नानाजी भी कहाँ हो पाए शतायु

पर वे जीवन संग्राम के महारथी थे

जब हम किसी के लिए संभावना नहीं थे

वे लड़े अपनी बेटी और उसके बच्चों के भविष्य के लिए

बैंक की जमा रक़म के ब्याज से बुढ़ापा काटकर

रुकी हुई पेंशन को पाने की कोशिश करते हुए मरकर

उन्होंने जो दिन काटे फाके कर-कर

उनकी लहलहाती फ़सल हैं हम

एक श्लोक हाथ के मूल में गोविंद की उपस्थिति बताता है

पर मैं ब्रह्मा पढता हूँ

क्योंकि बहुत साल पहले मेरी स्मृति में नानाजी ने ब्रह्मा बताया था

(या शायद मुझे ही ग़लत याद रहा हो)

हर सुबह ये श्लोक

मैं लंबी उम्र या किसी देवी-देवता की प्रसन्नता के लिए नहीं पढता

इनके बहाने मैं याद करता हूँ नानाजी को हर सुबह, वस्तुतः।

स्रोत :
  • रचनाकार : देवेश पथ सारिया
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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