नकोदर-होशियारपुर अप-डाऊन

मोनिका कुमार

नकोदर-होशियारपुर अप-डाऊन

मोनिका कुमार

और अधिकमोनिका कुमार

    रोज़ एक ही सड़क और लगभग एक ही बस में चार वर्षों तक दो घंटे

    सुबह और दो घंटे शाम को बैठने से धैर्य बढ़ता है। रोज़ जाने अनजाने

    चेहरे पढ़ने से आपके भीतर ऐसी प्रज्ञा जन्म ले सकती है जैसे आप इस

    दुनिया के सारे चेहरे पढ़ चुके हैं। पचपन लोगों के साथ अकेले सफ़र करने

    के बाद आप पाँच सौ, पाँच हज़ार और पाँच लाख तक की संख्या तक के

    सहयात्रियों के साथ अकेले लेकिन निडर होकर यात्रा कर सकते हैं। फिर

    यह संख्या और उसके छोटे या बड़ा होने का एहसास ख़त्म हो जाएगा,

    आप निडर हैं—इस सजगता का आवरण भी अपने आप गिर जाएगा। यह

    रोज़ाना सफ़र हर दुःख को एक स्थिति में बदल देगा, एक स्थिति जिसकी

    नियति एक दिन सुख में बदल जाना है। अत्यधिक आबादी वाले देश में

    सार्वजनिक स्थानों को रोने जैसे बेहद निजी कामों के लिए इस्तेमाल करने

    का गुण अर्जित करना अब कोई दूर की बात नहीं। वर्जित जो भी है अधीर

    के लिए वर्जित है। संसार को रोज़ चलती हुई बस के बाहर के पेड़ों की

    तरह आगे पीछे छोड़ने से यह एक दिन स्थिर हो जाएगा। आप संसार से

    दुःख पाना बंद कर देंगे। जबकि संसार में अब अधिक नहीं बचा देखने

    के लिए लेकिन सौभाग्यवश संसार की इच्छा का अंत जीवन के संघर्ष

    और सुख का अंत नहीं है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आश्चर्यवत् (पृष्ठ 107)
    • रचनाकार : मोनिका कुमार
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2018

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