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नदी में स्तंभ

nadi mein stambh

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

गोरान बाबिच

गोरान बाबिच

नदी में स्तंभ

गोरान बाबिच

और अधिकगोरान बाबिच

    (मेरी पीढ़ी के लिए)

    मैं नदी में स्तंभ हूँ

    जिससे पानी नापा जाता है

    महसूस करता हूँ कि वह मुझ पर रहा

    मेरे गले तक चढ़ा रहा

    कितना सुंदर लगता है, सुंदर लगता है

    जब मेरे सिर पर चिड़िया उतरती है

    कितना मनोहर होता है जब मछेरा

    मुझसे अपनी नाव बाँधता है

    इस्पात का हूँ मैं

    अच्छा होता

    यदि होता उस इस्पात का

    जिस पर ज़ंग नहीं लगती

    भय लगता है, भय, निकाल फेंकेगी मुझे

    एक खुदाई मशीन पाट गहरा कर रही है

    और मैं काफ़ी ऊँचा नहीं हूँ

    भय लगता है, कोई दया की गुंजाइश नहीं

    आह, सब मेरे भाई बहाव के विपरीत रुख पर हैं

    और मैं सागर के निकटतम हूँ

    कैसे उन्हें सावधान करूँ

    कि ख़तरा रहा है

    अच्छा होता, अच्छा

    यदि नदी बहाव के विपरीत बहती

    फिर भी, मेरा हृदय सब समझ सकता है,

    सब, सिवाय ज्वार और भाटे के

    इसका मुझे भय अधिक है

    खुदाई मशीन, बाढ़ और सूखा की अपेक्षा

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 188)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : गोरान बाबिच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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