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मोन पड़ैए

mon paDaiye

श्याम दरिहरे

श्याम दरिहरे

मोन पड़ैए

श्याम दरिहरे

और अधिकश्याम दरिहरे

    की होइत छैक विपन्नता

    देहक नग्नता भूख

    तत्जनित उपेक्षा अपमान

    एकर कयलासँ बखान

    बुझयमे नहि अबैत छैक बात

    जाधरि भोगने नहि होइ व्यथा।

    पावनिओ-तिहारमे नहि छलैक

    कोनो अखुलास

    पसरल रहैत छलैक एकटा

    अनभुआर उदासी

    एकटा अनमनायल मोन

    एकटा निमुआन आदंक—

    आइ तँ पावनि खा लेब

    नाचि लेब सुकराती

    मुदा भोरे पिटयबे करत फेर सूप।

    एहने सन कोनो मुहुर्तमे

    बिआहि अनने छलहुँ अहाँकेँ।

    पहिल बेर लागल जे

    लक्ष्मी घर, दरिद्रा बाहर भऽ गेल

    देखऽ लगलिऐक बुलैत

    रंग-रभसकेँ साक्षात्।

    तँ नहि अछि मोन

    जे घरमे छलैक कि नहि बुतात

    मुदा घर करय लागल गमगम

    से ओहिना अछि अखिआस

    घर-संसारमे पोतल बुझायल

    पनिबोराक रंग

    फूसक घर भऽ गेल इन्द्रासन

    उधिआइत हँसीमे

    पायलक रुनझुन झनकैत छल

    पथार छल लगैत

    सौंसे आँगन सिंगरहार।

    फूजल केश

    पियरका साड़ी, हरियर ब्लाउज

    भरि बाँहि लहठी ठोप

    गोरकी काँति

    कजरायल मादक आँखि।

    यद्यपि नहि अछि आब

    किछुओ समतूल, मुदा

    एखनहुँ जँ पड़ि जाइए मोन

    तँ तकैत फिरै छी कोने कोन

    किन्साइत फिरि आबय

    हेरायल दिन जे

    भूखलो पेटे रही अहाँक संग

    तैओ भूख नहि पड़य मोन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : क्षमा करब हे महाकवि [मैथिली कविता-संग्रह] (पृष्ठ 27)
    • रचनाकार : श्याम दरिहरे
    • प्रकाशन : नवारंभ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2016

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