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संकेत की भाषा

sanket ki bhasha

राकेश कुमार मिश्र

राकेश कुमार मिश्र

संकेत की भाषा

राकेश कुमार मिश्र

और अधिकराकेश कुमार मिश्र

    जूट मिल की घनघनाते मशीनों के बीच में

    जब किसी मज़दूर को लगती भूख

    वह अपना हाथ पेट पर रखता

    प्यास लगती तो वहीं हाथ ले जाता मुँह तक

    और लघु-दीर्घशंका की स्थिति में हाथ

    आकार बदल लेते

    इन चटकल मिलों में होता इतना शोर

    संकेत ही होता संवाद का माध्यम

    जूट की बोरियों के उत्पादन का इतना दबाव

    पड़ोस के मशीन पर काम करने वाले मज़दूर को

    अपने ही भाई की बीमारी के बारे में

    पता चलता कई दिनों बाद

    किसी मज़दूर को आए अपनी पत्नी की याद

    तो कोई संकेत नहीं था उसे कहने के लिए

    अगर किसी कारीगर को अपनी नवजात बेटी को

    देखने का मन कर रहा हो

    उसके पास कोई संकेत नहीं बल्कि प्रतीक्षा थी

    दूर कलकत्ता में धूल से ढके चटकल मशीनों के शोर में

    अगर किसी को अपने गाँव की होली की याद आए

    वह मन के रंग में डूब सकता था

    कह नहीं सकता था किसी भाषा या संकेत में

    कोई मज़दूर बीमार पड़ जाए परदेस में

    कालिख और घुटन के बीच में था उसके पास

    सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड

    जिस पर पर वह बिहार के किसी सुदूर गाँव में

    इंतज़ार कर रहे परिवार को लिखता :

    ‘मैं ठीक हूँ। जल्द ही कुछ पैसे भेजूँगा। मुन्ना से कहना मन लगाकर पढ़े।’

    नींद से बहुत दूर खड़े

    अपने देह को घसीटते

    यही भाषा बची थी

    इन मज़दूरों के पास

    वे बहुत कुछ छुपा रहे थे दूसरों से

    और ख़ुद से भी।

    स्रोत :
    • रचनाकार : राकेश कुमार मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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