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लोकल-डिश!

lokal Dish!

हिमांशु विश्वकर्मा

और अधिकहिमांशु विश्वकर्मा

    जानते हो

    ज़िंदगियाँ गहरी जुड़ती हैं

    उनका जुड़ना

    आकस्मिक कभी नहीं होता

    वह भोर में ओस की बूँदों की तरह

    करती है इंतज़ार

    सूरज सरीखे जीवन के खिलने का

    तब वह रचती है

    अपना पर्यावास

    किसी अंधली आस में नहीं

    बल्कि एक नाद में

    एक गूँज होती है उसकी

    अपने रहवासियों को पुकारती

    हुई-सी

    हिमाल की कोख में

    यही रहवास था हमारा कभी

    हम जुड़ पाते थे

    धान के पौंध की तरह

    मिट्टी से

    उगते, बढ़ते

    पवन की लय में

    नाचते हुए फलते

    सहजता से जुड़ना

    कितना आसान होता है!

    हमने अपने लोगों को जोड़ा

    अपने हिमाल की

    हर नदी,

    हर पत्थर और वन की वन्यता को

    संस्कृति में बसाया

    लोक में

    ज़िंदा रहे हमारे पुरखे और पीढ़ियाँ

    मैदानों के संपर्क से पहले ही

    हमने बसाई

    सबसे विकसित सभ्यताएँ।

    पर अब

    अश्विन का घाम

    रीढ़ की हड्डियों को भेदता हुआ

    हमारा स्नायुतंत्र सुखाने लगा है

    हमारी दीठ को

    कमज़ोर करता हुआ

    सभ्य मैदान

    आज भी हिमाल से जुड़ना

    नहीं सीख पाया

    वह पहाड़ की देह को

    सपाट करना चाहता है

    वह घुसता है

    सरकारी ब्रांड की पीठ पर

    सवार होकर

    और उसे बनाना चाहता है

    अपनी तरह का सभ्य

    पर हिमाल के माथे पर

    जवाँ धड़कनों का बोझ है

    और उनकी अस्मिताओं की खोज है

    वह नहीं चाहता

    इस तरह की कोई घुसपैठ

    परंतु

    मैदान ने जुड़ना नहीं

    ख़लल देना सीखा

    उसने देखा केवल

    सवार होना

    वह हिमाल को बस

    ऊँट की पीठ समझता है

    वह सवारी करता हुआ लेता है आनंद

    और ख़ूब चाव से खाता है

    लोकल-डिश!

    स्रोत :
    • रचनाकार : हिमांशु विश्वकर्मा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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