मेरे कौतुक में
जीवित रही अज्ञात यात्राएँ
ध्वनियों के पीछे
छिपी रही अनुगूँज
और पैरों में पदचाप के चिन्ह
स्वप्न में अक्सर उतरती हैं
निराकारी परछाई
और बिखरती हैं
चहुँ ओर
पिता की किसानी का हल
छाती पर नहीं
टिका है मज़बूत पीठ पर
और रीढ़ की हड्डी में भरी है
माँ के हौसलों की मज्जा
मेरी घ्राण की शक्ति में
फसलों की गंध भरी हैं
और मेरी आँखों की
सबसे सुंदर तस्वीरों में
उभरती हैं धान रौपती हुई
स्त्रियों की तस्वीरें
बच्चों की तन्मयता छिपी हैं
उनकी हँसी के पीछे
कितना कुछ है
जो कहने के लिए कभी बना ही नहीं
तुम जानते हो वसंत फाग का मौसम है
मेरे कौतुक में
आ बैठता है वसंत बिन बताए
और दौड़ता मेरी नसों में
हँसता बचपन देखकर
खिलते चेहरे देखकर
लहराती फसलों में!
- रचनाकार : गीता मलिक
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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