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मेरा खोया प्यार

mera khoya pyaar

अनुवाद : सुरेश सलिल

लू शुन

लू शुन

मेरा खोया प्यार

लू शुन

और अधिकलू शुन

    पहाड़ों की तरफ़ रहती है मेरी महबूबा

    मैं उससे मिलने की चाहत से भरा हूँ

    मगर—

    पहाड़ों की ऊँचाई पर्दा बनी है।

    हारकर मैं अपना सिर डाल लेता हूँ

    और आँसुओं के फ़ौव्वारे छूटते रहते हैं

    चोगा भीगता रहता है।

    उसने मुझे सौग़ात में एक रूमाल दिया

    तितलियों से भरपूर

    मैं उसे क्या दूँ?—उल्लू!

    पता नहीं क्यों, अजीब बात है

    कि उसने मुँह फेर लिया

    और त्योरियाँ तनी हुई।

    शहर के बीचोबीच रहती है मेरी महबूबा

    मैं उससे मिलने की चाहत से भरा हूँ

    मगर भीड़ से डर लगता है।

    हारकर आसमान की तरफ़ ताकने लगता हूँ

    और आँसू बह-बहकर कानों तक आते रहते हैं।

    अबाबीलों का एक जोड़ा, स्केच किया हुआ,

    उसकी तरफ़ से मेरी सौग़ात

    कोरमकोर दिलासाओं का एक झुनझुना

    मेरी तरफ़ से उसकी सौग़ात।

    ग़ुस्से से भरकर, उसने मुँह फेर लिया,

    पता नहीं क्यों,

    और मैं भौचक हूँ।

    नदी के पार रहती है मेरी महबूबा

    मैं उससे मिलने की चाहत से भरा हूँ

    लेकिन पानी बहुत गहरा है;

    हारकर मैं अपना चेहरा घुमा लेता हूँ

    और आँसू बह-बह कर

    गरेबान के घुमावों को भिगोते रहते हैं।

    उसने मुझे सौग़ात में घड़ी की एक सुनहरी चेन दी

    और मैं उसे पसीने से लहालोट एक चेहरे की

    सौग़ात देता हूँ।

    ग़ुस्से से भरकर वह मुँह फेर लेती है

    पता नहीं क्यों, और मेरा सिर चकराने लगता है।

    एक बड़े आदमी के बँगले में रहती है मेरी महबूबा,

    मैं उससे मिलने जाने की चाहत से भरा हूँ

    लेकिन मेरे पास मोटरकार नहीं।

    हारकर मैं अपना सिर झटकता हूँ

    और मेरे आँसू यहाँ-वहाँ दूर-दूर तक फैला जाते हैं।

    वह मुझे गुलाबों की सौग़ात देती है

    और बदले में मैं उसे देता हूँ

    कत्थई साँपों की सौग़ात,

    ग़ुस्से से भरकर वह मुझसे किनारारशी

    कर लेती है—

    पता नहीं क्यों?...शैतान उठा ले जाए उसे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 72)
    • रचनाकार : लू शुन
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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