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मंथन

manthan

हमर मोनक थाह अहाँ नहि पाबि सकै छी।

भदबरिया पानि पड़िते

उजहियाक माछ जकाँ

नियतिक पोखरिसँ हमहूँ पड़ाय चाहैत छी।

मुदा पौहटीक दोबगली

सह-सह करैत लोक

टापि आकि गाँज

आकि अपन आंजुरसँ

हमरा छापि ने लिअय,

हम थकमका जाइत छी,

पोखरिसँ निकलि भगबाक

हमर सब उत्साह बिला जाइत अछि।

हमर विवशता अछि।

सभ्य कहयबाक पुरस्कार।

हम नियतिक पोखरिमे

औनाइत रहै छी

एम्हर-ओम्हर टौआइत रहै छी

नियति या सभ्यताक लाकेट

अपन गर्दनिमे लटकौने रहै छी।

तैयो अहाँ बुझै छी, हम सुखी छी।

सुख कहै छै ककरा?

पुछियो पोखरिक माँछसँ।

पूछि कऽ देखि लियऽ,

की उत्तर दैत अछि

जैविक उद्यानक बाघ, सिंह

आकि हरिण।

लोहा कि ईंटाक पैघ-पैघ देबाल

पक्का मकान,

सेवामे तत्पर नोकर-चाकर

सुरुचिपूर्ण भोजन

पानिसँ भरल झील

अभयारण्यक सब माहौल

राजसी जोग।

एक बेर पूछि तँ लियौ।

तेँ कहैत छी

हमर मोनक थाह अहाँ नै पाबि सकै छी।

ने अथाह मोनक तलमे पैसि

कोनो रोबोट अहाँक मदतिए कऽ सकैए।

मोनक थाह पयबाक लेल

कोनो कम्प्यूटर नहि

मोनक आँखि चाही

बस, प्रेमक आँखि।

स्रोत :
  • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 46)
  • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
  • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
  • संस्करण : 1988

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