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मनक बात

manak baat

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    नजरिकेँ खसौने, नजरिसँ बचौने,

    नजरिमे लहरिकऽ चलल जा रहल छी।

    मिलन एक दिन छल बनल वर वसंती,

    जुटल छल भवनमे विनोदक बराती।

    हवा कोन बहि गेल छनमे हिमानी?

    उजड़ गेल उपवन, मिझा गेल बाती?

    हृदय पर पड़ल अछि हमर लोह-पाथर,

    मुदा मोम भऽ हम गलल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    अहाँ संग बजला जेना बीति जुग गेल,

    कहू की? अहाँ तँ ने तनिको सुनै छी।

    बुझै छी अभागल कि हमरा एहन सन?

    हमर तूर-अरमानकेँ जे धुनै छी।

    एना अनठिऔने सुफल कोन भेटत?

    दिनोदिन गरलसँ भरल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरि कऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    कतहु भेल अपनेक दर्शन कदाचित,

    समझि लेल सूतल हमर पुण्य जागल।

    मुदा काटि बगली अहाँ बाट धैलहुँ,

    जेना बुझि हमरा कोनो ज्ञान-पागल।

    अहाँ तँ ओम्हर बेखबरि छी मगनमे,

    एम्हर हम वियोगे मरल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    कतेक छल सिहन्ता, कतेक सौख उमगल,

    पयरसँ मरदि कऽ अहाँ राखि देलहुँ

    कतेक फूल सूखल, कतेक पात टूटल,

    कुलिश सन वचन ज़ैऽ अहाँ भाखि देलहुँ

    विवश खढ़ जकाँ हम निराश नदीमे,

    प्रवाहक भरोसेँ बहल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    सुनू हे हमर मीत, गीतक विधाता,

    रहत कि जनम-भरि मनोरथ कनैते?

    सुमरनी समय केर संगो छोड़य,

    उमिर वीति जाएत घड़ी-पल गनैते?

    धरा पर हमर बीन साँसक बजै अछि,

    अहाँ मेघ-वनमे उड़ल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    ओना तँ तरेगन भरल अछि गगनमे,

    उगल चान जे, से मुदा एक कोनो।

    प्रणय केर महिमा एहन अछि जगतमे,

    लगै अछि सरस-स्वादु व्यंजन अनोनो।

    अहाँ गंध बनि कऽ पवन संग रमियौ,

    सुमन हम भ्रमरसँ धरल जा रहल छी।

    हमर बात मनक रहल आइ मने,

    अहाँ फेरिकऽ मुँह चलल जा रहल छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 55)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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