मैं और मेरी परछाईं

main aur meri parchhain

कौशल किशोर

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मैं और मेरी परछाईं

कौशल किशोर

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    मैं और मेरी परछाई बातें करते हैं

    घर-परिवार, दुनिया-जहाँ सब उसमें शामिल है

    हम रहते हैं साथ-साथ

    हम जीते हैं साथ-साथ

    हम लड़ते-भिड़ते हैं साथ-साथ

    उजाले में ही नहीं, अँधेरे में भी है यह साथ

    कुछ लोग हैं

    जो परछाई को घर में बंद रखते हैं

    कहते हैं कि वह घर के लिए बनी है

    उससे ही घर चलता है, चूल्हा जलता है

    बच्चे पालना, कपड़े फींचना

    इस्त्री करना, जूठे बरतन साफ़ करना

    मतलब हज़ार काम है जो उसे करना है

    मेरी परछाई इस घर को तौबा करती है

    कहती है कि जो करना है मिलकर करना है

    परछाई हूँ कोई ग़ुलाम थोड़े हूँ

    हमारा रिश्ता मालिक और मज़ूर का नहीं है

    वह मानती नहीं, ज़िद्दी है

    मेरे संग डोलती है

    जहाँ जाता हूँ, वह जाती है

    जब मैं जेल गया, वह भी साथ थी

    डंडे पड़े, दो-चार उसने भी सहे

    इस तरह सुख ही नहीं दुख में भी साथ रहती है

    समय के साथ कहानी बदल चुकी है

    कभी वह मेरी परछाई थी, अब मैं उसकी परछाई हूँ

    कि कहना मुश्किल है कि कौन किसकी परछाई है

    कि दोनों सियामी जुड़वाँ बहनें हैं

    वह जहाँ रहती है, वहीं मैं होता हूँ

    मैं जहाँ होता हूँ, वहीं वह भी होती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कौशल किशोर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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