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लेकिन डर

lekin Dar

जनमेजय

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लेकिन डर

जनमेजय

और अधिकजनमेजय

    लेकिन डर: अँधेरे में डूबे स्टेशन फिर भी मेरी नींद को खँगालने आएँगे,

    यद्यपि सोने से

    पहले मैं कोई कोई समाधान चुन लेता हूँ,

    जैसे—एक समाधान है जिसमें रात पूरब की ओर

    करवट लेकर सोती है। दिन की बैचेनी इसमें

    शांत और प्रश्न सपाट होकर गिरते हैं।

    —लेकिन डर...

    निष्कासन का आदी मैं—नियमों के विभाजन के बीच घर बनाकर रहता हूँ।

    मेरी एक अव्यक्त

    चेष्टा कि मैं कौन हूँ? मेरी कई आधुनिक चेष्टाओं को अस्थिर कर देती है।

    और इस अस्थिरता

    से घिरा मैं—उस घर में अपने डर का रियाज़ करने लगता हूँ।

    पृथ्वी के गर्भ में लाल तप्त मैग्मा, सूर्य का एक अंश, पृथ्वी की कक्षा में घूमता चला जाता है।

    सूर्य जो अपने रूप में कभी कहीं नहीं गया, सुबह लेकर आता है।

    लोग अपने में दबे-दबे से खड़े होने लगते हैं।

    भीड़ अपनी भगदड़ में अपने पैरों को कुचलते हुए चलती है।

    यह-यहाँ दिन की शुरुआत है...और डर!

    इतने सारे चहरें...इतने सारे दरवाज़ें... इतनी सारी खिड़कियाँ...

    लेकिन सभी अपर्याप्त।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जनमेजय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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