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अनचीन्हे पिता

anchinhe pita

शिवांगी गोयल

शिवांगी गोयल

अनचीन्हे पिता

शिवांगी गोयल

और अधिकशिवांगी गोयल

    पिताओं का रंग पक्का ही रहा

    दादियाँ बताती रहीं कितने सुकुवार थे वो अपने बचपन में

    किसी राजे-रजवाड़े के खानदान सरीखे

    इतने नाज़ुक पैर कि छिल-छिल जाते थे ज़मीन पर

    ऐसा साफ़ रंग कि रोज़ नज़र लग जाती थी

    परीछ के जलाने के लिए लौंग तैयार रखनी पड़ती थी हमेशा

    उनकी यादों में पिता एक शैतान बच्चे थे

    जो दादियों की पूजा भंग करने राक्षस बन के आते और मिसरी चुरा के भाग जाते

    या अपने छोटे भाई पर रौब जमाते, दूध पीने के लिए झगड़े करते

    चीनी चुरा के फाँकते चाचा के हाथ में एक मुट्ठी नमक भर देते

    या पतंग उड़ाने की डाँट से बचने दादा से डरे छत से कूद जाते

    कभी बर्फ़ के गोले से बंदरों को भगाते

    कभी बुआ की एक चोटी काट लेते

    हम बच्चों ने देखे ही नहीं ऐसे पिता

    हमने देखे चार पैंट-शर्ट का सेट बदल कर पहनने वाले

    जिनके पाँव दो जोड़ी चप्पलों में बे-तरह घिसे हुए, खुरदुरे, मिट्टी भरे हैं

    हमने जाने गंभीर, समझदार पिता जिन्हें सही-ग़लत पता है

    जो ग़लती होने पर गुस्से से मूक हो जाते हैं

    जिनकी शरारती मुस्कान एक आश्चर्यजनक घटना है

    जिन्हें हमने रजवाड़े के क़रीब कम, ग़रीबी के क़रीब अधिक पाया

    पिताओं की आँख में बचपन की कोई स्मृति नहीं, बस दुख है

    ज़िम्मेदारियाँ निभाते थक चुके हैं वो

    धूप उनकी त्वचा का एक हिस्सा हो चुकी

    उस साफ़ रंग तक पहुँचने नहीं देती जो कभी नज़र लगने का सबब रहा होगा

    धूप उनको नज़र लगने से बचाती रही

    हम बच्चे देख ही नहीं पाए सुकुवार पिताओं को

    दादियों की कहानियों से बाहर

    हमने जाना बस पिता का पक्का रंग, स्याह मज़बूत देह

    और हमारे लिए रोज़ घिसता, होम होता उनका जीवन

    हमें यह तक नहीं पता उनके बचपन की सबसे सुंदर स्मृति क्या है

    उनके बचपन के सपने क्या हैं, उनकी आँखों में कितनी नींद है

    उनका आज का रक्तचाप क्या है

    उनके जीवन के कितने दिन बचे हैं

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवांगी गोयल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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