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लौगाई

laugai

संतोष सिंह

और अधिकसंतोष सिंह

    बात जब 1989 के भागलपुर दंगे की होती है

    हमारी दृष्टि बरबस जाती है एक गाँव पर

    लौगाई नाम से अब यह अभिशप्त है

    जब पुलिस शिथिल और संवेदनहीन हो गई थी

    गिद्धों और चीलों ने की थीं यहाँ

    एक महान गवेषणात्मक रिपोर्टिंग

    इन बदनाम पक्षियों ने प्रशासन को बताया

    116 लाशों के दफ़न किए जाने की कहानी

    उस खेत में ऊपर से फूलगोभी लगा दिए गए थे

    फिर कमीशन, ओमिशन, कंपनसेशन

    सारे सरकारी उपक्रम हुए

    पर हासिल कुछ भी नहीं हुआ

    परबत्ती मुहल्ले में जिस मां का 17 साल का बेटा

    उसकी आँखों के सामने मारा गया

    जिस परिवार ने अपने 12 सदस्य खोए

    वो किशोरी जो जलकुंभी के बीच

    पानी के अंदर साँस रोके ज़िंदा रही

    अपने लोगों के मारे जाने के बाद

    इन सबको कोई क्या कंपनसेट कर सकता है

    और ये सब कोमल रेशम के शहर में हुआ था

    जहाँ कभी दानवीर अंगराज कर्ण अपना न्याय दरबार लगाते होंगे

    पर ये दौर मंडल और कमंडल का था

    इस आक्रामक भीड़ के पास से जो भी गुज़रे थे

    उन्हें सिंदूर और अबीर के तिलक लगाए गए थे

    कुछ ही घँटों में ये सिंदूर शोणित में बदल गया था

    मानवता के भाल पर ये अपयश का तिलक था

    जो वर्षों से रिस रहा है अश्वत्थामा के

    मस्तक के नासूर की तरह

    कहते हैं लौगाई में फूलगोभी की बहुत अच्छी फसल होती है

    विद्वेष की ज़मीन को हमने बहुत उर्वर बना दिया है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संतोष सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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