Font by Mehr Nastaliq Web

किसान की बिटिया

kisan ki bitiya

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

किसान की बिटिया

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    हम हन किसान की बिटिया,

    हमका सानसूल कपड़ा जुरा,

    ना जानी नीक अनाजु कैस?

    हरि! कब यहु दुःखु कटी हमरा?

    बुअनी हमका बहुतुइ चाहैं,

    ना कबहूँ नागा बात कहैं,

    कौन्यउ कामे मा हमैं लगावै

    मा, वहि सकुची सदा रहैं।

    अकिले मा हमरे ब्याहे का

    बप्पा ते जिकिरा किहा करैं,

    हमरी अभिलाखन का सिगरी

    वहि उनका ब्यौरा दिहा करैं।

    बप्पा जो कुछु गहना-गुरिया

    कोई नीक-बसन लावैं,

    बहि हमरी बदि राखइँ छिपाइ,

    तिथि-परबिउ कामे ना लावैं।

    जो चीज खाइ वाली आवइ

    वहिका आधा-हिसा बटाइ,

    वहि धरि राखैं हमरी बदिकै

    देइँ अकेले मा खवाइ।

    हम पूछी—'छवटकन्ना पाइसि?

    वहि कहिनि कि 'ऊ खूबैं खाइसि,

    हम कह्यन—'तनिकु हमहुँक दैद्यौ

    मुल उन्है बँधि पाई रहाइसि।

    मुँह तन लखि डारि गरे ग्वप्फा,

    हमका उर ते चपटाइ लिहिनि,

    छाती मा दूधु छलकि आवा,

    दृग जलु भरि, हमकौ दुखी किहिनि।

    हमरेउ दृग आये डबडबाई,

    दुइ आँसू बहिरी निकसि परे,

    देखे बुअनी दुखु पैहैं

    पोंछयन मुँहु पीठी बार करे।

    छवटकन्ना भइया, हमका

    जो ढ़ेर पियार परानन ते,

    कबहूँ आँसू निकरैं, वहिकी

    सुनि भोली-भाली बातन ते।

    वहि दिन बप्पा प्याँड़ा लाये,

    दुइ भइया औ, दुइ हम पायन,

    भइयकि आगे हम का खाई।

    ताखेम वहिकी बदि धरि राखेन।

    मुल वहिकी बात कही का? जस

    प्याँड़ा पाइसि दौरति आवा;

    हम कनिया माँ लीन्हयन उठाइ

    गरे चपटि गा, सुखु पावा।

    तीकै समूच प्याँड़ा हमरे

    मुँहि माँ गुँजियावइ लाग जबै

    'हम पाइ चुक्यन भइया हमार

    पावइ' हम ऐसे कहेन तबै।

    मुल जिद्दी कब बात सुनै

    भुकुरुँधा हुइके ब्वाला

    'तुम खैहों तौ खैबा, नै नाहीं'

    सुनि हमरौ जियरा ड्वाला।

    बप्पा की बात बताई का

    बहि हमका बहुतु पियारु करैं,

    जो धनु-दौलति नाजु पातु

    पावै, हमरी बदि जोरि धरैं।

    वहि कहिनि बुआ ते तब ऐसे

    परसौं जब रासि घरइ आई

    ताइ डेहरियम देउ, दानौ

    छुयउ, लरिकिनी घर जाई।

    जब ऊखै बेंचि घरै बहुरे,

    रुपया बुवनी के हाथ दिहिनि,

    इनमँक ना पैसउ एकु उठै,

    अस कहि म्वहिं लखि मुँहुफेरि लिहिनि।

    फिरि आँसू पोंछति उन्है लख्यन,

    हम उनकी पीड़ा जानि गयन,

    हा ईस्वर! ऐसे दुखिया निधनी

    कैहाँ हमहूँ आइ खल्यन।

    1953 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 33)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY