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ख़ामोशी के सिवा सब कुछ बिकता रहेगा

khamoshi ke siva sab kuch bikta rahega

रिदम राही

रिदम राही

ख़ामोशी के सिवा सब कुछ बिकता रहेगा

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    कहीं मछली के पीस की थाली बिकती है

    कहीं जल बिन मीन की तरह

    कोई शरीर हम बिस्तर होने के लिए

    ख़रीद लिया जाता है।

    हम सब बाहरी आवरण में रचे-बसे हैं

    अंदर क्या कुछ है, उथल-पुथल

    इन सब बातों से मतलब कौन रखता है

    कड़वी सच्चाई पर हर शख़्स ख़ुद को मौन रखता है।

    नहीं, नहीं, मैंने ये नहीं लिखा

    कि खाना ज़रूरी नहीं है

    पर खानाबदोश की तरह खाना ज़रूरी नहीं है

    हाँ, पर किसी को क्या गुरेज

    ये बाज़ार है जिसमें सीमाएँ कहाँ हैं

    जहाँ मिट्टी बिकती है, लकड़ी बिकती है, पानी बिकता है,

    ताकत बिकती है, सुंदरता बिकती है

    पर विक्षोभ कहीं रह जाता है

    जिसका हिस्सा तराज़ू की तह में सिमट नहीं पाता।

    बाहरी काया से भरा हुआ इंसान भी

    जीर्ण हो सकता है

    हाँ, ये सच है

    जो जीने के लिए चुपचाप मौन हो सकता है

    और बाज़ार में बैठ सकता है।

    बड़ा दुकानदार है आदमी,

    और इन्हीं दुकानदारों के बीच ग्राहक भी

    पर कुछ बातों का कोई ग्राहक-फोरम नहीं होता

    शिकायतों की ज़िल्द में दीमक लग जाता है

    बेकद्री का दीमक,

    मतलब भर का दीमक,

    बिस्तर की वासना का दीमक।

    बिक रहा है सब कुछ यहाँ पर तो,

    एक घने अँधेरे की छाँव में,

    और दिन के उजालों में ग्रहण लगाती

    रेशा-रेशा यूँ बाज़ार हो चला है

    दाम बढ़ चुके हैं,

    महँगाई चरम पर है

    भीतर से जलता हुआ आदमी

    ठंडक का ठौर ढूँढता है

    कल-कल बहता हुआ आदमी

    कहीं जम जाता है स्थिर,

    इसी बाज़ार में।

    हूक-हूक टहनियाँ टूटती हैं,

    प्रतिपल जड़ें जमीनें छोड़ती हैं

    अनदेखी-अनजानी चाँद की रोशनी के नीचे

    टूटते सफ़ेदी के मंडप

    यथार्थ अब कितना घना है, सघन है

    दुनिया अपने में मगन है।

    जिसकी जेब में जितना पैसा,

    वह सिर्फ घर और ज़रूरत की चीजें नहीं खरीदता

    बाज़ार में सब कुछ खुला हुआ है,

    खुले हुए रेट की तरह

    बंद नहीं हैं उनकी खिड़कियाँ

    धुआँ है वहाँ से बाहर

    अपने-अपने उन्माद का

    और यही आदम की जात चुप है,

    बहुत चुप है, शायद चुप रहेगी

    और बिकते हुए बाज़ार में सब कुछ बिकता रहेगा,

    सिवाए तुम्हारी ख़ामोशी के।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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