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कविताओं की देह पर ऐसी रात

kavitaon ki deh par aisi raat

रिदम राही

रिदम राही

कविताओं की देह पर ऐसी रात

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    उठते हुए मौन के सागर में

    हिलोरें मारती हैं कुछ बातें

    रात की चाक पर चाँदनी में झिलमिलाती

    कुछ एहसासों की खुलती हैं परतें

    तब मौन पर भी सागर की लहरों की

    झर-झर सुनाई पड़ती हैं

    मगर शांत होकर हममें लिपटती हुई

    फिर मन के कणों के बीच इठलाती हुई

    दिल की सूखी ज़मीन पर नमी फैलाती हुई

    आगे बढ़ती है

    हाँ, अपनी सी वो रात जिसके प्रतिबिंब में

    चाँद झाँकता है और हमको भी देखता है

    हम उस दिन सितारों के भी साथ होते हैं

    कायनात में भीगते, ठँडी रेत पर पड़े रहते हैं

    बहुत से अधूरेपन यकायक

    अपने पूरेपन की तरफ़ चल पड़ते हैं

    ऐसी रात कितने दिन हो जाते हैं, जल्दी नहीं आती

    कविताओं की देह पर ऐसी ही रात

    मन के जुगनू बैठते हैं, उन्हें चूमते हैं

    कागजों के हिस्से अपनी स्याही लेकर

    सागर में घुलने लगते हैं

    हम उस दिन बंधे हाथ खोल देते हैं

    दिल को भी बहा देते हैं उसी सागर में

    ऐसे कितने ही काग़ज़ होते हैं

    जो फिर लहरों सा तैरते हैं

    उन पर रखे शब्द चमकते हैं

    झर-झर करते सुनाई पड़ते हैं

    आँखें चाँद को ताक़ती हैं

    देह रेत पर शीतल होती है

    दिल का हिस्सा भीगा लम्हा समेट लेता है

    और रूह...

    रूह इन्हीं काग़ज़ों पर रखी नज़्मों को

    ख़ुद में लपेट, कुछ पल के लिए

    लहरों में शांत होकर उतर जाती है

    समा जाती है

    ऐसी रात कितने दिन हो जाते हैं,

    जल्दी नहीं आती।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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