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कौवों का प्रश्न

kauvon ka parashn

क्रीस्तिआन गोमेस

क्रीस्तिआन गोमेस

कौवों का प्रश्न

क्रीस्तिआन गोमेस

और अधिकक्रीस्तिआन गोमेस

     

    हमें कई बार जश्न से निकाल फेंका गया

    मगर इस बारे में ईश्वर को सफ़ाई देने का

    यह न मौक़ा था न सही जगह थी;

    उस ईश्वर को जिसकी अनुपस्थिति खटकती थी ज़ोर से।

     

    यदि तुम उसको फेरी वाला समझ बैठते

    जो आवर्धक काँच बेचता है इधर-उधर

    तब तो दुनिया गुज़र जाती तुम्हारे आँखों के सामने

    जैसे गुज़रता है दुश्मन का शव

    ठीक तुम्हारे दरवाज़े से।

     

    और ऐसे में कितने सायों की

    ज़रूरत है एक अच्छी ख़रीद के लिए

    प्रेमियों के इस अनावश्यक मोल-भाव के बाज़ार में

     

    -यह घर तुम्हारा भी है। पर वे लोग तो मेरे साथ रहेंगे पूरा ही वीकएंड।

    फ़ोटोग्राफ़ कितने हैं ये

    जिनसे मोदोत्ती11 तक को जलन हो जाती :

    चापुलतेपेक22 के एक स्टेडियम की ख़ाली सीढ़ियाँ,

    इंक़लाब से गर्वित लोगों का सड़कों पर उतरना,

    ख़ासकर करंट भरी तारें, क्रेनें, हाँ क्रेनें और उपकरण

    ख़ासकर वे सभी हमेशा के चेहरे जो

    उन क्रेनों को उपकरणों को

    चालू करते, चलाते, बैटरी भरते, और चलाते,

    और वे हमेशा ही पुराने चेहरे रहेंगे :

    सब चेहरे (हमारी तरह) रिहर्सल करते शटर के आगे,

    नहीं पता किसी को यह विदाई है या नहीं।

    पर सुनो, मुझे सूर्य के साथ रहने दो,

    यह आख़िरी अलंकार है

    जिसमें एक साथ उभर पाती है

    आने और जाने की चाह,

    चाह जो हिस्सा है उसी रोज़मर्रा के खेल का

    जिसमें दर्शक और कलाकार दोनों को पहले ही पता है

    शुरुआत और अंत

    मुझे उस हवा के बीच रहने दो

    मगर दोनों ही बाध्य हैं खेलने को यह खेल

    जो हिला देती है खुली खिड़की के पर्दे को,

    रहने दो मुझे उम्मीद लिए उस दिन की

    अनावश्यक होगा जिस दिन

    कि मेल खाएँ वस्तु और नाम

    पुकार सकूँगा तुम्हें उस दिन मैं प्रियतमा, चेहरा,

     

    विपुला, क्रिया।

     

    ऐसा करना झूठ होगा, ज़रूरी नहीं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 161)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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