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कारे बादरा

kare badara

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

कारे बादरा

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    (बिरह गीत, लोकधुन, कजरी)

    आये पुरुवैया के झवाँका

    छाये कारे बादरा

    ना बिदेसिया का सँदेसवा

    लाये कारे बादरा।

    वहि तौ उमड़ि-घुमड़ि के आये

    पानी सिंधु पार ते लाये

    बिजरी की तरवारि बनाये

    धनुहा छीनि इन्द्र ते छाये,

    भौ सब दुनिया बदि लै धाये,

    घर-घर घहर-घहर घहराये,

    रसिया जहाँ होइँ जा हुँवनै

    बंजारे बादरा।

    छाये कारे बादरा।

    सुरजौ तपिगे पाइ जवानी,

    इनका देखे मरिगै नानी,

    बरसा झम-झम-झम-झम पानी,

    नद्दी तलिया सब उबरानी,

    तजि मरजाद डगर बिलगानी,

    अबहुँ आये, दयाँह सुखानी।

    अकिली तकि म्वहि मारे डारैं

    हा! हत्यारे बादरा।

    छाये कारे बादरा।

    इनका सब दुखहरन बतावैं,

    मुल कुछु हमरी समझ आवैं,

    जो यहि जिय की जरनि बुतावैं

    बारू बीच रतन उपजावैं,

    हमका काहे बदि तरसावैं

    औरौ बिरह-अगिनि परचावैं।

    झट्टै लाउ ब्वलाइ दुवारे

    जिय के प्यारे बादरा।

    छाये कारे बादरा।

    जो तुम लावौ उन्हें ब्वलाई,

    तुमरा स्वागतु बड़ा मनाई,

    गल्लिन मा पुछारि नचवाई,

    पंछिन राग-मल्हार गवाई,

    भुँइ के बिबिध सिंगार सजाई।

    तुमरी सुचि आरती उतारी,

    अरे हमारे बादरा।

    छाये कारे बादरा।

    8 दिसम्बर 1959 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 68)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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