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जिनकी मुझे सेवा करनी थी

jinki mujhe seva karni thi

सुमेधा

सुमेधा

जिनकी मुझे सेवा करनी थी

सुमेधा

और अधिकसुमेधा

    भइया को खाना परोस दे,

    अरे! बड़ा भाई है तेरा।

    मुन्ने के कपड़े धो दे,

    चल! छोटा भाई है तेरा,

    पूरे डेढ़ साल छोटा।

    चाचा से पूछ,

    कुछ और लेंगे?

    फूफा ने खाना खा लिया?

    चल, थाली हटा दे।

    पलटकर मैंने कहा,

    “ये थोड़ी मेरे भाई हैं!”

    बुआ ने सुना,

    तपाक से बोलीं—

    “भाभी, तोहर बेटी बसिहें ना।”

    बुआ ने ऐसा क्यों कहा,

    मैं देर तक सोचती रही।

    माँ भी दिन भर चुपचाप

    जाने क्या सोचती रहीं।

    रात में माँ ने समझाया—

    सिर्फ़ भाई नहीं,

    चाचा, फूफा, नाना, दादा

    और मौसा की भी

    करनी होती है सेवा।

    और ब्याह के बाद

    ससुर, देवर, जेठ, ननदोई

    सबकी करनी होगी सेवा।

    मैं ख़ूब ध्यान लगाकर सुनती,

    उँगलियों पर गिनती जाती।

    पर संख्याएँ इतनी बढ़ जातीं

    कि सब गड्डमड्ड हो जाता।

    मैं भूलती रहती

    उन रिश्तों के नाम

    जिनकी मुझे सेवा करनी थी।

    अंततः उन्हें मैंने एक वाक्य में दर्ज़ कर लिया:

    जिनकी सेवा में मुझे जीवन बिताना था,

    वे सब पुरुष थे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमेधा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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