पुराने प्रेम
मेरा मन हर समय तुम्हारी ओर बहता रहा है
और मुझे याद है वह पहला क्षण
जब हम मिले थे—तब ऐसा लगा
जैसे दो उथली, छोटी, बलखाती धाराएँ
बिना मानचित्र, असहाय-सी बहती हुईं
कठोर ऊबड़-खाबड़ धरती से गुज़रती चली जा रही हों
जैसे आत्मा का कोई पुराना गीत
हमें आगे ढकेल रहा हो
और हम यूँ ही बहते रहे
उस निर्णायक दिन तक
जब तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद
कल्पना और स्वप्न से भी आगे
हमने स्वयं को एक ही शिला पर लेटा पाया
अब एक ही धारा बनकर बहते हुए
प्रेम के समृद्ध भू-भाग में धूप पर सवार
वर्षा के बाद सब कुछ हरा, उज्ज्वल, चमकता हुआ—
आँखें दमकतीं, मुस्कराता सूर्य
हम पर झुक आता
पुराने प्रेम,
तुम्हें सोचते ही मैं सचमुच उदास हो जाता हूँ—
आकाश की तरह नीला
जो बारिश का वादा थामे रहता है
साँझ की निस्तब्धता में टपकती हुई रोशनी के बीच
मुझे याद आता है वह पहली बार
जब हम मिले थे—तब ऐसा लगा
जैसे हम एक लंबी नदी हों
जो चौड़ी भी है और गहरी भी
कभी हम चट्टान की भाषा की तरह मौन रहते थे
कभी हम चलते-बहते अपना नदी-गीत गाते थे
कभी हम ठंडे और शांत होकर
घने वृक्षों की छाया में ठहरते थे
कभी झूलते-डोलते बाँस की जड़ों से हल्के-से लिपटते
कभी बेफ़िक्री से खड़ी घाटियों से झरते हुए
कभी स्वभाव में उग्र
किनारों को तोड़ती बाढ़ की तरह
लेकिन चाहे ज्वार हो या भाटा
बारिश हो या सूखा
हम कभी प्रेम की कठोर धारा से
बहुत दूर नहीं गए
पुराने मीठे प्रेम—
आज तक मैं समझ नहीं पाता
कि हम इतनी गाद और रेत में
कैसे फँस गए
पत्थरों और मलबे के जाम में
यहाँ तक कि हमें अलग-अलग बहना पड़ा
अब हम प्रेम के इस थके हुए भू-दृश्य में
अकेले-अकेले बहते हुए
उस दूषित बहाव से दूर भाग रहे हैं
जो प्रेम को थका देता है
मुझे आज भी
उस चमत्कारी तूफ़ान की चाह है
जो मुझे फिर से तुम्हारी धारा से
मिला दे
मैं अपने नमकीन, शोकाकुल भाग्य को कोसता हूँ
कभी-कभी लगता है—
शायद अब बहुत देर हो चुकी है।
- रचनाकार : लिंटन क्वेसी जॉनसन
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए शायक आलोक द्वारा चयनित
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