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हमरै सिखावा नाही बोलै हो सुगनवा

hamarai sikhava nahi bolai ho suganva

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

हमरै सिखावा नाही बोलै हो सुगनवा

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    बाटेन परुऐ से सजना बिमार का करी,

    सखी लागे नाही जियरा हमार का करी,

    नाही बाटै अँचरे हमरे अधेलवा,

    गोदिया रोवै मोर छोटका गदेलवा,

    नाही उतरै हो मूड़े से बोखार का करी।

    सखी लागे नाही...

    जहाँ-जहाँ जाई हम परि जाय पथरा,

    भीग-भीग जाय मोर अँसुवन से अँचरा,

    कौनो मिलै नाही हमका मोहार का करी।

    सखी लागे नाही...

    बरसै बदरिया निहारी अँगनवा,

    भूख दोना गाड़ी से झुराय गवा तनवा,

    केहू देत नाही हमका उधार का करी।

    सखी लागे नाही...

    घरहूँ कै लोग भइले हमसे बेगनवा,

    हमरै सिखावा नाही बोलै हो सुगनवा,

    केहू आवै नाही हमरी गोहार का करी।

    सखी लागे नाही...

    दुखवा से देहिया पियर मोर लागै,

    पपिहा कै बोलिया जहर मोहे लागै,

    नाही आवै मोरी बगिया बहार का करी

    सखी लागे नाही...

    दुखवै बीति रही हमरी उमिरिया,

    कब मोरे अँगना देखाई हो अँजोरिया,

    भइले परवाना भीगल सियार का करी।

    सखी लागै नाही...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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