गोपी-सुआ
gopi sua
वह नदी यहाँ बहती है, एक प्रेम कथा कहती है
तीखी हवा यहाँ चलती है, बारिश प्रलय दूत बनती है
नदी उफन कर जब बहती है, परबत की छाती दहती है
पत्थर गिरते मलबा आता, जीवन कठिन बनाकर जाता
इस भांति सदा हाड गलाकर, घाम पानी एक समझकर
विपदा में पीछे न हटकर, जीवन का होता निर्वाह
कभी हरी सी शीतल मन सी नदी लहर में एक उपवन सी
भिनसारे की घाम, जुन्याली लाती शाम
कौन थी वह सुआ हिया की तुकुडी आँखकी पुतई
सुधियों में भूला था तनमन वह प्रिया बनी रागमय जीवन
वह प्रिया
जिसने गोपी के अंतर में परबत सी ऊँचाई भर दी
रंगीली बैराट की नदीं के प्रवाह की गतिमयता और जल की गहराई रच दी
राजुला मालुसाही की गाथा का वह गायक जागर और बौल गीत गाता था
उसका दर्द भरा सुर हिय को ब्याकुल कर जाता था
हुड़का लेकर देकर थाप भूल बिसर जाता था
पहाड़ के जीवन के रण में कोसी के प्रांगण में स्थित
सकार में औजी के घर में जनमा गोपालराम
दादा पिता गाथा गाते थेआठ बरस की छोटी वय में
बैराट प्रान्त के गायक को सुन जिसकी आत्मा पैठ गयी धुन
बैराटी शैली में तबसे आत्मा और गहन मन से
वह मालूशाही सुनाता था गांव-गांव कुड़ी कौतिग उत्सव
गीतों में रच बसकर अनुभव मीठे दर्द को गाता था
मालुसाही का अद्भुत गायक गोपीदास अब कहलाता था
यौवन के प्रथम वेग में प्रेम के गहरे संवेग में
एक भोली-सी पर्वतवासी
पानी भर कर लाती घर पर
घास लकड़ियाँ रखकर सर पर
धूप-सी उजली
नदी-सी चंचल
घास-सी कोमल
पर धरा-सी स्थिर
सीधी-सरल ग्राम बाला संग
नदी में जैसे मिलता निर्झर
जाति भेद को विस्मृत कर औघट प्रेम बहा जाता था
प्रेम राह में चलना दुष्कर जाति- भेद से प्रेम का अंतर
शलभ दीप पर गिरता अकसर जात-कुजात को न बूझकर
अंत लपट में जलता ही है प्रीत स्नेह में जुडा जिया
सुआ ने प्रतिपल साथ दिया पर क्योंकर समाज यह समझे
गोपी सुआ को गाँव में धमकी अगर दिखे फिर मुखडी चमकी
बोटी -बोटी खंड -खंड कर कोसी में कर देंगे विसर्जन फिर एक बन में बास हुआ
जीवन फिर वनवास हुआ जात- पांत के भेद से ऊपर
गोपी सुआ ने प्रेम को धरकर वह हरित मरुस्थल छोड़ दिया
संग चली परिणीता उसके गन्धर्व ब्याह की डोरी में बंधके
अब समय कठिन हुआ जाता था अभावों में रहकर दिनभर
तेज हवा के झोंके सहकर परबत परबत भटक भटक कर
भूखे प्यासे पथ पर रहकर जीवन गीत बुना जाता था
दुःख सहकर जो राग हैं बुनते मन की गहरी बिथा को सुनते
जीवन में संघर्ष को चुनते पल -पल जोड़कर तिनके तिनके
जीवन गीत बहा जाता है
रामगढ़, हल्द्वानी
सोमेश्वर सुरम्य कौसानी आश्रय लेकर भोर साँझ तक कपडे सीकर
रोटी पानी चल पाता था रात की निस्तब्धता में
तारे चाँद के संग विचरते कंदराओं में जुगनू बलते
कभी -कभी अँधेरे मेघ गरजते जर्जर घर में दीपक जलते
रात निस्तब्ध हुई जाती थी तब दिन भर के श्रम से थककर
दुनिया के दुःख भूल भालकर दोनों प्रेमी संग विचरते
दिल की व्यथा को पिरो पिरोकर अपने दर्द को कंठ में भरकर
मीठे सुर में गीत प्रिया के हित गाता था
जीवन कितना कब तक हम हैं सुख कितने और कितने गम हैं
गोपीराम की पीड़ा समझकर अपना ही दोष मानकर
पछतावे में जल- जलकर क्षय रोग में गल- गल कर
एक शिशु को प्रिय को देकर मालूशाही की कसमें देकर
सुवा चली गई अंतिम घर लोक का सुर बतलाता है
नाम गोपुली समझाता है शायद गोपी प्रेम समर्पित वह
गोपिदास कहलाता था कपडे सीकर उदरपूर्ति कर
कौसानी में ही अब रहकर एकाकी जो छोड़ गई
दिवस- साँझ में गाँव-गाँव में गाथा उसके लिए गाता था
वह पैठी है मन के भीतर कहते कहते नीरवता में एक दिवस वह
महाशून्य में रच बसकर वह अनंत के आदि सुरों में
मिला वहाँ जहाँ थी प्रियवर
अब भी जब बारिश होती है उसकी बूदों को झंकृत कर
प्रेम की गाथा बतलाता है वह पैठी है मन के भीतर
हिम अंतर में सुर देकर
अब भी कलकली लगा जाता है
***
इस कविता की प्रेरणा नैनीताल की संस्था ‘पहाड़’ द्वारा प्रकाशित मोनोलॉग ‘गोपी मोहन’ से मिली है। यह मोनोलॉग 1990 में प्रकाशित हुआ था। इसका लेखन बृजेन्द्र लाल साह ने किया था। आवरण-परिकल्पना गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की थी, रेखांकन यशोधर मठपाल का और अंतिम पृष्ठ पर शब्दांकन मृगेश पांडे का था।
- रचनाकार : कल्पना पंत
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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