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गूँग गवाह

goong gavah

आशाराम ‘जागरथ’

और अधिकआशाराम ‘जागरथ’

    खाये-पीये अबर अघाये

    बीते दिन कै याद सताये

    पोर-पोर पाती दर पाती

    बहुत जनेन कै राज दबाये

    कोऊ आवै कोऊ जाये

    कोऊ छाँहें बइठ छहाँये

    काली माई के अँकवारे

    बिन कुम्हलाये बिन मुरझाये

    जड़ें जमाये जुग-जुग जगहर

    गड़ा बा गहरी माटी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    सुख-दुःख-गम खाइ’क् भयौ बड़ा

    हे नीम ! तू काहे हरा-भरा

    केव न्याय करै अन्याय करै

    तोहरे बरदास कै पेट बड़ा

    संगी-सँग्हरी कै समौरी सब

    मरि-उखरि परे झुराइ गये

    जब काल कै गाल बनी नदिया

    जरि-मूल समेत समाइ गये

    तबहूँ तू हयौ मुँह बाँन्हि खड़ा

    केतना कुछ घटा कहानी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    केतनौ लोगै आवा होइहैं

    राही थकि-चूरि बइठ होइहैं

    दुनिया भै देस-जवारी कै

    बतकही बात गावा होइहैं

    मरि मुरा गये पइदा बहुतै

    अब दियौ बताय ढीठ होइकै

    यकतरफा धन-धरती बटिगै

    कइसै सब छोट-बड़ा होइगै

    बहुमेर ग्यान भण्डार भरा

    सच बात बताय दियौ सबकाँ

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    लरछा-लरछा तूरे होइहैं

    केतनौ दातून किहे होइहैं

    नीबी कै पाती औ’ चइली

    पाका पै पीसि धरे होइहैं

    सींका सिल-बट्टा कूँचि-काँचि

    गरमाय लोह छौंके होइहैं

    जूड़ी-बोखार मा तीत-तीत

    काढ़ा बनाय पीये होइहैं

    छाँहे जुड़ाय केतनौ मजूर

    सोये होइहैं दुपहरिया मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    मुँह खोला चाहे ना खोला

    कतहूँ ना हियाँ-हुवाँ डोला

    मन कै पीरा कुलि रचि डारब

    कल्ले-कल्ले काने बोला

    होई जब पूछ-पुछउवल तौ

    परिसहिजे आपन बात कह्यौ

    तोहरी बाती काँ के काटी

    सच्ची बाती पै ठाढ़ रह्यौ

    जाति-धरम-पइसा सबके

    डारे बा परदा आँखी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    तोहरे गुन कै महिमा अपार

    डउँगी–डउँगी औ’ डारि-डारि

    बूझब तोहार सगरौ बतिया

    बाती कै कुलि गूझा निकारि

    गाहे-बिगहे आवा करिबै

    जरिकोरा दुबक बइठ रहिबै

    रचि गीत-गवनई टूट-फूट

    बेसुरा कबित गावा करिबै

    बहुतै बा भार कपारे पै

    बाँटै’क् बा देस–जवारी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    भाखा तोहार समझत बाटी

    बोले जा काने सुनत हई

    दुनिया औ’ देस समाजी कै

    बतकही पँवारा रचत हई

    रचना कै असल रचइया तू

    हम तौ खाली अनुवादी हन्

    यक गूंग गवाही के औजी

    दस्तावेजी फरियादी हन्

    आवाज हुवै ना बाती मा

    गुरबा-गरीब की लाठी मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    खंडित करम ललाटे संचित

    सुनतै कान कसैला मन-चित

    चिक्कन नीम-निबौली गूदा

    खायन भरिमुँह अनतित-अनतित

    पात पतीला मा खौलायन

    देहीं मलि-मलि खूब नहायन

    चुरयन कूँचि सींक कै ढेंपी

    फदका पीकै बला भगायन

    फटकै ना परसन्तापा अब

    अनतित घुलिगै बोली मा

    यकतनहा नीम कै पेड़ गवाह

    बचा बा पाहीमाफी मा

    स्रोत :
    • पुस्तक : पाहीमाफी (पृष्ठ 27)
    • रचनाकार : आशाराम ‘जागरथ’
    • प्रकाशन : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
    • संस्करण : 2021

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