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हे यउ बटोही

he yau batohi

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

हे यउ बटोही

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    भने जाइत छी मिथिला दऽकऽ,

    तीरथ घाटे-घाट छै।

    हे यउ बटोही एही बाटे,

    श्री कैलाशक बाट छै॥

    (1)

    दक्षिण-उत्तर गंग-हिमालय,

    दुनू के बीच।

    पच्छिम छूटल भोजपुर तँ,

    बूझू मिथिला थिक॥

    अही माझ दऽ पूबे-पूबे,

    पूब छोर पर जायब।

    जैखन छूटत मिथिला अहाँ,

    भूमि बंग के पायब॥

    सिक्किम के सीमा नाथूला,

    फोलल चीन कपाट छै।

    हे यउ बटोही एही बाटे,

    श्री कैलाशक बाट छै।

    (2)

    तीरे-तीरे यज्ञ भेल,

    तीरभुक्ति कहबैए।

    नारी आओर पुरुष के पूछय,

    सूगा वेद पढ़ैए॥

    जन्मभूमि थिक जनक-जानकीक,

    धानक, विज्ञानक धाम।

    जाम-लताम, आम के गाछी,

    गज-गज गामे- गाम॥

    विश्वबन्धु एहि पुण्य भूमिपर,

    की प्रकृति केर ठाठ छै।

    हे यउ बटोही एही बाटे,

    श्री कैलाशक बाट छै॥

    (3)

    मण्डन-लछ्मीनाथ अहाँ के,

    अही माटि पर भेटता।

    थाह शंकराचार्य ने पाबथि,

    कथा भारतीक कहता॥

    बेरि-बेरि श्री बैद्यनाथ,

    गौरी कैलाशहु तेजल।

    उगना बनि श्री उग्रनाथ,

    कवि विद्यापति के सेवल॥

    वाक् शारदा केर पग-पगपर,

    एही भूमिपर वास छै।

    हे यउ बटोही एही बाटे,

    श्री कैलाशक बाट छै॥

    (4)

    श्री कैलाश मान सरोवर,

    बाबा के राजधानी।

    सड़कक पथ सोझे पहाड़ पर,

    भेटता औढरदानी॥

    नगपति पदतल दक्षिण खलखल,

    लछ्मी फूजल केश।

    कलकल सरिता कोशी-कमला,

    धन-धन अपन देश॥

    मित्र लेल कुसुमित कानन थिक,

    शत्रुक लेल समाठ छै।

    हे यउ बटोही एही बाटे,

    श्री कैलाशक बाट छै॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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