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गरीब की द्यवारी

garib ki dyvari

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

गरीब की द्यवारी

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    रिमझिम बरिखा सठियानी,

    बदरा मुँह पोंछि चियाने,

    बिजुरी की चम-चम कम भइ

    सुरजन के जोस सिराने।

    पानी थिरान तलियन का,

    नदी मरजाद सँभारिनि,

    भुँइ का जिउ जल ते भरिगा,

    म्यढ़ुका सब चुप्पी धारिनि।

    रावनु मरतै भै सरदी,

    अब रामराजि सी प्यारी,

    कातिक के गरे लपिटि के

    तब आई सुभग द्यवारी।

    ज्यहि के स्वागत मा मूँजा

    रेसमी-धुजा फहराइनि,

    खरगैंचा मामा आये,

    पंछी पखना फैलाइनि।

    गै साँझ ड़ुड़ुम्मति आई

    चौदसि की राति अँधेरी,

    जुगुनुन की पल्टनि घूमैं,

    सब नखत लगावैं फेरी।

    पैरा बिछाइ के पौढ्यन,

    छ्वटकन्ना प्याट लगाये,

    ओढ्यन बसि एकु अँगौछा

    बहु चिंता हिये दबाये।

    जब राति तिहारा बीती,

    पछुवै की डाक बँबानी

    तब कुलबुलान लरिकौना

    कुछ हमरिउ द्याँह जुड़ानी।

    बप्पा! अब जाड़ा लागैं

    करवट लैके ब्वाला,

    तब उठा घुचघुचा जिय मा

    नख-सिख सरीर का ड्वाला।

    हम छाती ते चपटायन,

    वहिकै बसनु वढ़ायन,

    उप्पर ते पैरा झाँप्यन,

    अपन्यौ का वहेम छिपायन।

    भिनसार भवा तौ मलिकिन

    बोलीं-हैं आजु द्यवारी,

    ना लायौ तेलु देरी

    घर कैसे करी उजारी।

    हम कह्मन-तसल्ली राखौ,

    सबु संझा लौ हुइ जाई

    आगे ना कुछु कहि पायन

    मन मा चिंता भरि आई।

    इन परबिन बिन का भाँजी,

    काहे बदिकै औतीं?

    डहती हम कँगलन का

    दुखियन की बिपति बढ़ौतीं?

    अब कहाँ दद्यवारी मैया।

    घर मा गरीब के आइउ'

    है भूँजिउ भाँग जिनके,

    उनकी बदिकै का लाइउ?

    जो उधरा-पातिउ लैके

    कौनिउ बिधि दिया जराई,

    तौ का हमका दै दयाहौ

    जो खुसी तुम्हारि मनाई?

    फिरि यहे तका ते स्वाचति

    ब्यरिहा तलिया ढिंग पहुँच्यन,

    तब लाल बंबु सबिता का

    पुरुबैं ते उमसति देख्यन।

    हम हाथ जोरि बरु माँग्यन

    हे सुर्ज नरायन सामी।

    तुम सबके मन की जानौ

    हौ पूरे अंतरजामी।

    तनि हमरिउ बिथा निहारौ

    कुछ ऐसी जुगुति बतावौ,

    ज्यहिते परबी निपटावौं

    घर मा दुइ दिया जरावौं।

    करि बिनै ताल मा पड़िल्यन,

    बरछी अस नीरु दुखारा,

    मुल निसि जड़ानि देहीं छुइ

    जल का ठंढापनु हारा।

    फिरि थोरी कट्ठी माटी

    बहिरी निकारि के लायन,

    थोपि-थापि दस-बारा

    क्वँदवरिया तका बनायन।

    घामे मा सुखवै रक्ख्यन

    तीकै फिरि घर वर चलि भ्यन

    गल्ली मा चिंता ब्यापी

    ब्याकुल मनहें मन सोंच्यन।

    देरिन का कामु निपटि गा,

    अब तेलु कहाँ ते लाई,

    है तीर यक्कौ दमड़ी,

    हा! कैसे कामु चलाई?

    मुनिया का बरही लागी,

    आगे का ब्याहु रचैबा,

    दाना-दमड़ी कुछु नाहीं,

    सागरु क्यहि तना थहैबा?

    कुल मिला पाँच मन दाना

    ब्यचिबा तौ का खैबा

    है परा सालु सम्पूरन,

    कैसे घर-बारु जियैबा?

    महतौं बाबा तिर आयन

    उनका सबु हालु बतायन,

    माँग्यन उधार चौबन्नी,

    तब कहूँ यकन्नी पायन।

    वह लैके घर का आयन,

    बिटिया की अम्मै दीन्ह्यन,

    कह्यन कि तेलु मँगावौ

    कहि ठंढ़ि साँस यक लीन्ह्यन।

    वइ बिटिया कैहाँ , दीन्हिनि

    वह गल्लिम कहूँ गिराइसि,

    आई ठिठुकति भुकुरौंधी,

    सूखे मुँह हालु बताइसि।

    तब मलिकिनि मारै दौरीं,

    वह आँसू रोइ बहाइसि

    हम कनिया लिह्यन बचायन,

    गुच्ची असि पाँव बिंधाइसि।

    फिरि साँझ भई पछुवैं ते

    सुरजन की चली सवारी,

    सुलुगाइसि बिटिया उपली,

    ग्यन जगवै ख्यात दुखारी।

    तब देरिन की इच्छा लै

    तलिया के नेरे आयन,

    क्वै गोरु उनका गौंजिसि

    हम फूटी-टूटी पायन।

    हमरे मन मा दुखु उमड़ा,

    पहिले तौ गुस्सा आई,

    मुल चुप्यनि घर का चलिभ्यन,

    साजी दुइ तीनि उठाई।

    लायन मलिकिनि का दीन्ह्यन,

    हमरे दुइ आँसू आये,

    आँसू लखिके वह रोई,

    लरिका-लरिकी चिल्लाये।

    हम धीरजु धरि समुझायन,

    कबहूँ सूधे दिन ऐहैं,

    जब वहिकी मरजी होई,

    सब बिपती कटि जैहैं।

    11 नबम्बर 1956 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 84)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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