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गइल्या हमरी नगरिया अँधेर कइके

gailya hamri nagariya andher kaike

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

गइल्या हमरी नगरिया अँधेर कइके

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    हमै बार-बार जिन याद आवा सजना।

    जिन रतियौ कै निदिया उड़ावा सजना।

    आस तोहरे मिलन कै लगाये बैठे,

    तोरे डगरा मा नयनवा बिछाये बैठे,

    कबौ अपनी अटरिया बुलावा सजना,

    जिन रतियौ...

    आवा मोर फुलवरिया बहार बन के,

    रहबै तोहरे चरनवा तोहार बन के,

    वही प्रितिया कै गितिया सुनावा सजना,

    जिन रतियौ...

    गइल्या हमरी नगरिया अँधेर कइके,

    बाट्या अपनी महलिया अँजोर कइके,

    मोरे अँगनौ मा दियना जरावा सजना,

    जिन रतियौ...

    नैन खोला एक दाँय भरि जाय गगरी,

    लट खोल के बिखेरा छाय जाय बदरी,

    परवनवौ कै जिया जुड़वावा सजना,

    जिन रतियौ...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 7)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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