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हमारी गिनती

hamari ginti

अनुवाद : अक्षय कुमार

मार्टिन कार्टर

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मार्टिन कार्टर

हमारी गिनती

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    जाल का मुँह खुलते ही

    उसमें फँसी मछलियों की

    आँखों में तैरने लगता है

    बेडौल-सा होता जाता एक क्षितिज

    लहरें भी चली गई हैं

    कहीं दूर

    छोड़ कर उन्हें

    बिल्कुल निःसहाय।

    किनारे टहलता

    बगुला भी

    इतनी सारी मछलियों को

    एक साथ तड़पता देख

    पहले तो हो जाता है

    कुछ हैरान

    फिर, अचानक,

    हाथ आए

    इस शिकार में

    वह भी बँटा लेता है अपना हिस्सा

    मार कर झपट्टा

    ले उड़ता है

    दो-एक मछलियों को

    दाब कर अपनी चोंच में।

    इधर,

    मछुआरिन के रूप में भी

    मौजूद है वहाँ

    एक और बगुला

    मछलियों की तड़पन से कुछ परेशान

    लेकिन,

    अपनी पहरेदार निगाहों को

    आसमान में जमाकर

    कितनी तन्मयता से

    कर रही है वह

    जाल में फँसी मछलियों

    की गिनती।

    सचमुच

    आत्म-समर्पण के चक्कर में

    फँसते ही

    हम बना लेते हैं, ख़ुद को

    शोषण के एक पूरे युग का हिस्सा

    बगुले की हैरानी

    या मछुआरिन की परेशानी

    दोनों से जूझते-जूझते

    याद करते हैं

    उन लहरों को

    जो चली गई हैं कहीं दूर

    छोड़ कर हमें कवचहीन।

    क्या सचमुच

    इन मछलियों की तरह ही है

    हमारी भी ज़िंदगी

    क्या इसलिए हुआ है हमारा जन्म

    कि हम बन जाएँ गिन-गिन कर

    उपभोग की जाने वाली कोई जिन्स

    क्या इसी को कहते हैं जीवन

    क्या यही है हमारा भविष्य।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 237)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : मार्टिन कार्टर
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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