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आओ, बाहर

aao, bahar

इब्बार रब्बी

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इब्बार रब्बी

आओ, बाहर

इब्बार रब्बी

और अधिकइब्बार रब्बी

     

    बालसखा बद्रीनाथ वर्मा मोहन के लिए

    बंद कमरे, ठीक है।
    टेबल लैंप को रोशनदान के रास्ते ऊपर कोट की तरफ़ फेंक दो।
    किवाड़ों में झिर्री क्यों है?
    अपने रोमकूपों के अनहद नाद से इन्हें मढ़ दो।
    ठहरो!
    मैं ये किवाड़ उतरवा कर दीवार चुनवा देता हूँ।
    आदमी क्यों जाता है भीतर!
    आदमी क्यों जाता है बाहर!
    क्यों खोलता है दरवाज़े!
    क्यों खिड़कियाँ!
    क्यों रोशनदान!
    क्यों सूरज!
    क्यों टेबल लैंप!
    क्यों फ़िलिप्स!
    क्यों बजाज!
    तुम्हें अब कोई तकलीफ़ नहीं होगी।
    दुनिया के पाँच मुल्कों के एटम बम जोह रहे हैं बाट,
    सूरज का मुँह काला कर देने की।
    नीले अँधेरे की बिल्लियाँ चमचमाती हैं आँखें
    मंदिर के नीचे और पीपल के ऊपर
    तुम्हारे सिरहाने जलता मत्स्याकार टेबल लैंप फोड़ देने के लिए।
    मैंने सात हज़ार साल तक
    अँधेरी गुफ़ा के आवेग को पाला है दिन में, दिमाग़ में।
    जो तुम्हारे हर दरवाज़े पर कीलित कर देगा
    एक ईसा मसीह, दो आल्बेयर कामू।

    डरो नहीं, दोस्त! तुम्हें कुछ नहीं होगा।
    सब मुझे ही लादना होगा।
    ईसा मसीह के बासी थूक को,
    आल्बेयर कामू के प्लेग जर्जर दिनमान को,
    और काली कुरूप थुलथुल, नीली नसों की नदी को।
    तुम्हें सिर्फ़ क़ैद रहना है, मेरे अवचेतन के गर्भ कुंडों में।
    तुम्हें सिर्फ़ दिवास्वप्न देखने हैं,
    मेरे मरे हुए नीले घोड़े की अयाल पर लेट कर।

    तुम ज़िम्मेदार हो
    मेरी लड़खड़ाती आवाज़ के पुल के नीचे खड़ी
    रोने वाली लड़की के लिए।
    तुम ज़िम्मेदार हो।
    मेरे कमरे की टाइमपीस के सही-ग़लत वक़्त के लिए
    खाट के नीचे झूलती,
    मकड़ियों की ताज़ा संस्कृति के लिए।
    और मैं भूल गया हूँ कि
    क्या करना है ख़ाली वक्त में अपने लिए?
    तुम हो मेरे लिए
    लेकिन मैं हूँ अपने ही लिए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कवि ने कहा (पृष्ठ 15)
    • रचनाकार : इब्बार रब्बी
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2012

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