पिता की मृत्यु पर
अनाथ नहीं हो जाती बावर की वनकन्या,
वह जीती है दाड़िम,
बेडू और महासू की छत्र-छाया में
तमसा के घाट को पार करती हुई,
तट पर भेड़ों को सुनाती है
अपनी व्यथाओं के गीत
गोधूलि होते ही वह लौटती है
दहलीज़ पर
टिकाकर घास के गट्ठर को
पिरोती है
जीवन के हिस्से से
पहाड़ की तस्वीर
तमसा के घाट पर ही
रोके जाते हैं उसके पैर
फिर एक बार
टूटती है
उस पर लाँछनों की शमशीर
तब चंद रातों को सजाने,
बहाया जाता है उसको मैदानों की ओर
बेच दिए जाते हैं
उसके स्वप्न
ताकि उसके जीवन में
राजमा बोते
साधु हुए पिता की
फूँकी जा सकें
असंख्य चिताएँ!
जब खुले आसमान से
बंद कंक्रीट के डब्बों भीतर काटे उसने
दो ग्रीष्म, दो शरद और दो शिशिर
उसने कुरेदी दीवारें
नोचे कंचुक और शिराएँ
उसने काटना चाहा स्नायुतंत्र
नए मालिक ने
रुधिर में भरनी चाही सभ्यता की गंध
परंतु
विदुर होती है वनकन्या
वह जानती है बचाव के तरीक़े
उसको पता होता है
जान हथेलियों पर रख
पहाड़ पर अगर
बंदूक़ से
भालू मार गिराना है
तो ढलान की तरफ़
भागना होगा
पर
मैदान समतल होता है
पशु को मार गिराने का
तरीक़ा भी
यहाँ समतल ही होगा
दो बसंत, दो सावन,
दो हेमंत भोगने के बाद
भोर में घुघुतों1 के डैनों-सी फड़फड़ाती
वनकन्या जब लौट आती है
अपने पर्यावास में
उजास से भर जाता है
माँ का चेहरा
अम्मा के गालों पर उगे ओस के फूल
झरते हुए पूछते हैं
सबला के हाल।
- रचनाकार : हिमांशु विश्वकर्मा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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