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एक कॉल

ek kaul

अनुवाद : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज

सीमस हीनी

सीमस हीनी

एक कॉल

सीमस हीनी

और अधिकसीमस हीनी

    “बस अभी उन्हें बाहर से बुलाती हूँ, रुकना ज़रा”

    —उसने कहा

    ‘‘दरअस्ल, मौसम यहाँ इतना अच्छा है कि

    बस मौक़ा मिलते ही निराइ-गुड़ाई में लग गए’’

    तो मैंने देखा कि

    वह हाथ और घुटनों के बल कटनी मशीन के बग़ल झुके

    एक-एक डंडी को, जाँच-परख कर अलगा रहे थे

    जो भी ठीक से खिला नहीं था या कमज़ोर रह गया था

    या पत्ते नहीं उग पाए थे जिन पर

    उन सब छोटे-मोटे पौधों को काट कर ख़ुशी-ख़ुशी फेंक देने में लगे

    हालाँकि थोड़े अफ़सोस के साथ भी…

    तभी मुझे एहसास हुआ कि

    हॉल की घड़ियों की टिक-टिक की भारी आवाज़

    और कई गुना भारी होकर गूँज रही है

    पेंडुलम धूप में चमक रहे हैं

    चुप पड़े आईने में फ़ोन अकेला इंतज़ार कर रहा है

    और तब मैंने ख़ुद को सोचते हुए पाया :

    कि अगर वे दिन आजकल की तरह होते तो

    मौत हर आदमी को ठीक इसी तरह बुलाती।

    आगे उसने जो भी बोला

    मैंने तपाक से बस कह ही दिया

    प्यार है मुझे तुमसे।

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