Font by Mehr Nastaliq Web

डिपो नेगोरो

Dipo negoro

अनुवाद : सुरेश सलिल

ख़ैरुल अनवर

ख़ैरुल अनवर

डिपो नेगोरो

ख़ैरुल अनवर

और अधिकख़ैरुल अनवर

    ग़ुलामी की बेड़ियाँ झटक फेंकने के इस दौर में

    तुम फिर हमारे बीच हो

    और चकित-विस्मित अंगारे दहक रहे हैं

    तुम बहुत आगे गए हो, बेख़ौफ़

    इंतज़ार करते हुए—

    हज़ारों-हज़ार दुश्मनों का,

    तुम्हारे दाएँ हाथ में तलवार है और बाएँ में कटार

    और सीने में, कभी हार मानने वाली रूह

    बढ़ो

    ये जांबाज़ ढोल नहीं पीटते

    दुश्मन पर हमला बोलकर ये पेश करते हैं

    अपनी ख़ुद्दारी का सबूत

    मौत से पहले

    एक बार कुछ कर गुज़रने के लिए

    बढ़ो

    अपने वतन के लिए

    तुमने एक मशाल जलाई है

    बरबादी ग़ुलामी से बेहतर है बेहतर है

    अपनी हस्ती मिटा देना

    ज़ुल्म सहने के मुक़ाबले

    बेशक हमारी मौत के बाद सही

    लेकिन ज़िंदगी को आख़िरकार होना तो ज़िंदगी ही है!

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 302)
    • रचनाकार : ख़ैरुल अनवर
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY