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धूप का धर्म

dhoop ka dharm

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

धूप का धर्म

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    ओस की बूँद-सी झर जाती है रात सुबह की घास पर

    चिड़ियों में चहचहाने लगता है भोर का पवित्र रंग

    रात की सारी ख़ुशबुएँ घुल जाती हैं सिरहाने पड़े बालों में

    बिस्तर छोड़ देते हैं उनींदे सपने मेरी आँख खुलने से पहले

    सलवटों में उलझा छोड़ देते हैं प्रेम।

    खिड़की में बैठी रातरानी पहनकर आती है धूप की एक लकीर

    चूमती है मेरे पैरों को अपनी गर्म साँसों से कुछ पल

    फिर मुस्कुराती, समा जाती है वापस सलवटों में।

    होंठों पर ज़मी पपड़ियाँ ओस का दस्तख़त हैं प्रेम के संविधान पर

    रातरानी की देह पर इठला रहा है नदियों का संगीत

    मैं महसूस करता हूँ फ़िज़ा में लौटती ख़ुशबुएँ

    और अपने आग़ोश में लौटती धूप का धर्म।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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