धर्म और ज्ञान हिंसा का पर्याय नहीं है
dharm aur gyaan hinsa ka paryay nahin hai
सुमन शेखर
Suman Shekhar
धर्म और ज्ञान हिंसा का पर्याय नहीं है
dharm aur gyaan hinsa ka paryay nahin hai
Suman Shekhar
सुमन शेखर
और अधिकसुमन शेखर
यह समय कवि के आलोचक बनने का है
आलोचक के कहानीकार बनकर आत्म प्रंशसा के फूल चढ़वाने का है
कहानीकार के प्रपंच में लीन रहने का है
कर्मठ सुसंस्कृत युवा लेखकों के हाथों
सोशल लिंचिंग का समय है
मौन, वरिष्ठ लेखकों के मुँह में गाढ़े थूक-सा बंद है
सभा में बैठे हैं केवल दुर्योधन और धृतराष्ट्र
द्रोपदी हो गई है विचार, जिसे कोई भी नोंचता जा रहा है
इस समय का हाहाकार भविष्य में पेट की गाँठ बन जाएगा
जिससे न उबरा जाएगा और न ही टाला जाएगा
शब्दों को बरतने वाले
शब्दों को लहूलुहान कर रहे हैं
मठाधीशों का बोल-बाला है
माफ़ कीजिएगा सियारों का बोलबाला है
विचारो की लड़ाई लड़ने वाले
शान्त-मौन होकर ज़रा सोचने की हिम्मत कर लें
काँप जाएँगे चारो तरफ़ के गूंज की आवाज़ से
सचमुच घृणा करेंगे खुद से!
उम्मीद तो रही ही नहीं अपने श्रेष्ठों से
क्या लिया और क्या देने की राह पर हैं हम!
विचार, अहम के हाथों फड़फड़ा रहा है
धर्म और ज्ञान हिंसा का पर्याय बन चुका है
हर कहानी में ‘पर’ है दोषी तो स्वयं कहाँ है भाई!
यह समय
केवल और केवल मवाद है जिसके भीतर छिपी है द्वेष की गंध
डूब जाने से ज़्यादा
अभी प्रयत्न केवल मर खप जाने या बचे रहने का है
महत्वपूर्ण सत्य हमेशा निजी हुआ करता है
उसे किसी पर थोपना और प्रतिक्रिया में असंतुष्टि की स्थिति में
विचारकों द्वारा किया गया वैचारिक प्रहार सही है क्या?
साहित्य की भेड़ें खो गईं हैं
सुना है गुम हुई भेड़ें लौट नहीं पाती
जैसे लौटता नहीं है शब्द और बीता हुआ समय
हिंदी साहित्य पूरी तरह दिवालियापन की गर्त में धंस रहा है
नमन है उन बहादुरों को
संभाले रहो अपना मोर्चा फिर भी श्रद्धेय।
- रचनाकार : सुमन शेखर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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