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देखता आ रहा हूँ

dekhta aa raha hoon

निकोलाई रेरिख

निकोलाई रेरिख

देखता आ रहा हूँ

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    एक अपरिचित व्यक्ति आकर रहने लगा

    ठीक हमारे उद्यान के पास।

    हर सुबह बजाता था वह अपनी गुसली

    गाता था अपना कोई गीत।

    हमें लगता था कभी-कभी

    वह एक ही गीत दुहराता है

    पर हमेशा नया होता था

    उस अपरिचित का गीत।

    हमेशा कुछ लोग खड़े होते थे फाटक के पास।

    हम बड़े हो गए थे

    काम पर जाने लगा था भाई

    विवाह योग्य हो गई थी बहन

    पर वह अपरिचित अब भी गाता था

    उससे अनुरोध करने गए—

    वह हमारी बहन की शादी में गीत गाए।

    हमने पूछा उससे—

    कहाँ से लेता है वह शब्द नए-नए?

    और इतनी देर तक

    कैसे नए रह पाते हैं उसके गीत?

    वह जैसे हैरान हुआ

    दाढ़ी ठीक करते हुए कहने लगा—

    मुझे लगता है मैं कल ही

    आपके पास बसा हूँ

    मैं अभी तक यह भी नहीं बता पाया

    जिसे मैं अपने चारों ओर

    देखता रहा हूँ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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