समय को कुछ भी ढकने के नियम नहीं आते
हमारा यूटोपिया एक बूढ़ा वैद्य है
यह कोई मानसिक दशा हो सकती है
जिसे मैं सुलझाना नहीं चाहती
भागते रहना—भागते रहने की एक अवस्था है
मैं चाहती हूँ हवा थोड़ी देर के लिए रुके
ताकि मैं सुन सकूँ न कहने लायक़ शब्द
यह कितना भयानक है कि
किसी शहर के प्रेम में
लंबे अरसे तक नहीं रहा जा सकता
इसे जितना भी फ़ैंटेसाइज़ किया जाए
एक झूठ बन कर मन के कोने में ठहाका लगाता रहेगा
हम इन सबसे बचना चाहते हैं
जैसे हम बचना चाहते हैं
गुनगुने से गर्म की ओर बढ़ने से
गुलाबी के सुर्ख़ होने से
पत्तों के सूख जाने से
फटी हथेलियों के राज़ खुलने से
लचीलेपन के बुत बन जाने से
हम सबसे ज़्यादा डरते हैं अपने आपसे
अब मेरे पास कोई प्रेरणा नहीं बची
सार्थक चीज़ों का अपना एक फ़रेब है
एक दिन यह तय था कि
यह दुनिया ईश्वर बचाता है
वह मर गया नीत्शे के हाथों
एक बेढंगे-से इल्ज़ाम में
फिर यह दुनिया माँ बचाती थी
उफ़् क्या जाहिल होने का और कोई प्रमाण नहीं
मैं इस तरह के किसी भी षड्यंत्र से
अब बचना चाहती हूँ
औरत, स्त्री, प्रेमिका…
ये दुनिया के सबसे मुर्दा शब्द हैं
जिसे एक नपुंसक और बीमार मानसिकता
अपने साथ ढोती रहती है
यह दुनिया कौन बचाएगा
कोई नहीं, बिल्कुल नहीं
हम सब एक ढलाननुमा विचार और स्थिति में जीते हैं
हमें लुढ़कते देर नहीं लगेगी
जब तक झूठ हमें बचाए हुए हैं
मेरे अंदर अब किसी भी तरह की आशा जन्म नहीं लेती
आशा एक ज़हर का काम करती है
इसे समझने के लिए मैं
अट्टालिकाओं की लाल-पीली रौशनी देख रही हूँ
मैं बचना चाहती हूँ सवालों से
जो हाशिये पर एक ही स्थिति में वर्षों से खड़ा है शांतिदूत लिए
क्या तुम हमें अपनी आशाओं से इतनी बेरहम मौत दोगे
हमें मत बचाओ तुम्हारी दया हमें दर्दनाक मौत देती है
बूढ़े भिखारी की हड्डी जितनी
चमड़े के अंदर धँसी है उतनी ही बाहर
हमें दया के नाटक से बचना होगा
सबसे निर्दय हमारी दया है
कई दिन बीत गए ट्रेन आई और चली गई
लोहे के टकराने की आवाज़ लगातार आती और जाती रही
लेकिन एक दृश्य मेरे मन में फफूँद की तरह फैलता रहा
दया न होती तो निर्ममता होती
निर्ममता दुःख और आघात से बचाती है
चीज़ों के सटीक होने के नियम ने विध्वंस फैलाया है
मेरी हत्या कर दो
तब भी मेरी राय यही रहेगी कि
दया दयावान् होने से बचाती है
- रचनाकार : सृष्टि वत्स
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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